संगीता का पति झालु ठेला चलाने का काम करता है। दिन भर जद्दोजहद के बाद किसी तरह 60 से 70 रुपया कमा लेता है। झालु शराब का आदी है। अपनी कमाई का आधा हिस्सा वह शराब पीने में गंवा देता है। बांकी के बचे पैसे वह संगीता को देता है। संगीता उन पैसों में 8 से 10 रुपया रोज बचाती है। ताकि महीने का मकान भाड़ा दिया जा सके। बांकी के पैसे से घर का खाना चलता है। यहां अंदाजा लगाया जा सकता है कि रोज 20 से 25 रुपया का खाना घर में आता है। कमरतोड़ महंगाई में उसके घर में क्या बनता होगा यह कहने की बात नहीं है। किसी तरह अपने और अपने बच्चों का पेट भर लेती है। संगीता को अपने पेट से ज्यादा जवान हो रही बेटी की चिंता है। इतनी कमाई में पेट तो किसी तरह भर जाता है। लेकिन बेटी की शादी कैसे होगी।
वह अपना दुख किसे सुनाये । दुर्भाय से वह गूंगी है। शायद झालू भी घर की परेशानी व दिन भर की मेहनत के कारण थक हार कर शराब को अपना साथी बना लिया है।
ऐसी बात नहीं है कि झालु इस बात को नहीं समझता है। वह भी इस बात को समझता है और बोलते बोलते फफक कर रो पड़ता है। झालु आखिर करें तो क्या करें। घर की माली हालत ठीक नहीं होने के कारण वह पढ़ भी नहीं पाया। किसी तरह दो अक्षर अपना नाम लिख लेता है।
सूर्य निकलते ही झालू ठेला लेकर निकल पड़ता है। गूंगी संगीता भी अपने बच्चों को छोड़कर दूसरे के घर बर्तन बासन धोने चली जाती है। दूसरों के घर से लाये भोजन और झालू की कमाई से बने भोजन को वह अपने बच्चों के बीच बांट देती है। जो बचता है अपना और झालू का पेट भर लेती है।
उसका भाडे़ का घर भी टूटे फूटे खपरैल का है।
झालू ने कहा कि कई नेताओं से अपने उद्धार की बात कही। लेकिन कोई नहीं उनकी बात सुनता थक हार कर अपनी बदहाली का जीवन को अपना साथी बना लिया है। बेटी की शादी की बात पर वह कहता है कि अब ईश्वर ही उसकी बेटी की शादी करायेगा।
यहां गौर करने वाली बात यह है कि हमारे नेता अपने आप को जनता का सेवक कहते हैं। लेकिन सेवा करने में पीछे हो जाते हैं। गरीबों के पैसे को अपने झोली में डाल लेते हैं। यहां तक कि प्रशासन ने भी कभी ध्यान नहीं दिया। न तो उसे इंदिरा आवास मिला, ना लाल कार्ड, मिली उसे क्या तो सिर्फ दुख भरी जिंदगी।
ऐसे कितने झालू मिलेंगे हमारे समाज में। कौन इनकी खैरियत सोचेगा। कौन इनके उद्धार को आगे आयेगा। यह एक यक्ष प्रश्न है।
ऐसे लोगों का उद्धार हो सकता है। बशर्ते की हमारे नेता अपनी मानसिकता बदल लें। प्रशासन अपने कर्तव्यों पर खरा उतरे। समाज के अमीर लोग अपने साथ साथ इनके बारे में भी सोचें।
तो शायद इनका उद्धार हो सकता है। लेकिन यह तभी संभव है जब हम संकल्प लेंगे। इसके लिए हमें ही आगे आना होगा। हमें ही अपने मन में संकल्प की भावना जगानी होगी।

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