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8/06/2010

लावारिश लाशों को दो गज कफन भी मयस्‍सर नहीं

हर मनुष्‍य की यह ख्‍वाहिश होती है कि जब तक वो जिंदा है तब तक वह सुखी पूर्वक जी सके और जब वह मृत्‍यु प्राप्‍त कर ले तो उसकी अंतिम विदाई चार कांधो से हो । उसका अंतिम संस्‍कार भी धार्मिक रीति रिवाज के साथ हो। चाहे वह हिन्‍दु हो या मुसलमान, सिक्‍ख या ईसाई। सभी धर्मों में अंतिम संस्‍कार का रिवाज है। महापुरुषों ने शायद सही कहा है कलियुग में मनुष्‍य अपना ईमान खोता जा रहा है। सही भी है उसका साक्ष्‍य यह तस्‍वीर है। मनुष्‍य इतना संवेदन हीन हो गया है कि वह मनुष्‍य को उसका हक नहीं दिला पा रहा। कल तक यही मनुष्‍य जो सबके साथ घूमता फिरता था आज उसकी यह स्थिति, बहुत शर्मींदगी की बात है। तस्‍वीर दिल दहला देने वाली है। मनुष्‍य के मरने के बाद यह स्थिति शायद इसके बारे में किसी ने सोचा भी नहीं होगा। यहां ना तो उसे दो गज कफन मिला ना ही दो गज जमीन। वह भी धार्मिक नगरी देवघर में। अखबार वालों ने भी इसे प्रमुखता से छापा। उनकी भी मंशा रही कि शायद खबर से किसी की आंख खुल जाय। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। देवघर शहर जहां द्वादश ज्‍योतिर्लिंगों में एक बाबा बैद्यनाथ विराजमान हैं। उस शहर में प्रशासन इतना संवेदनहीन हो गया है कि लावारिश मरने वालों को वह दो गज कफन मयस्‍सर नहीं करा पा रहा। जबकि प्रशासन को लावारिश लाशों के अंतिम संस्‍कार के लिए पैसे भी हैं। फिर भी इतनी शर्मनाक संवेदनहीनता। इस तस्‍वीर को जरा गौर से देखिए, ये एक लावारिश लाश है जिसे कुत्‍ते नोच नोच कर खा रहे हैं। बगल में एक और लाश पड़ी है सफेद रंग के बोरे में बंद, साथ ही यहां से ठीक 40 गज की दूरी पर एक और लाश पड़ी थी। आखिर क्‍या कसूर था इनका, जो मरने के बाद इन्‍हें कुत्‍तों चीलों के हवाले कर दिया गया। कसूरवार भी हो तो जब तक वह जिंदा है तब तक उसे सजा दी जा सकती है। लेकिन मरने के बाद ऐसी सजा देना यह किस कानून के पन्‍ने में लिखा है। इसका जवाब कौन देगा।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
ऐसी परिस्थिति दुबारा ना हो इसका क्‍या उपाय है। इसका एक ही उपाय है, एकता पूर्वक खड़ा होने का। हम जागरूक होंगे तो जग जागरूक होगा।