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प्रस्‍तुत कर्ता : अजय कुमार झा : लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
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12/19/2009

पनाह

शायद आपने एक शायरी सुनी होगी //// हमें तो अपनों ने लूटा गैरों में कहां दम था मेरी कस्‍ती थी डूबी वहां जहां पानी कम था///// शायद अंधी सुनीता के साथ भी ऐसा ही हुआ। उसे उसके मां बाप और बाद में ससुराल ने शराब की खाली बोतल की तरह खाली समझ कर घर से बाहर निकाल दिया। उस समय तो मानो सुनिता के सिर पर एक ही ठिकरा फोडा गया कि अब तुम बेकार हो चुकी हो। लेकिन आपने एक ऐसा भी गीत सुना होगा ////// जिसका कोई नहीं उसका तो खुदा होता है///// और सुनीता के साथ भी ऐसा ही हुआ। उसे हमारे शहर के एक आश्रम में पनाह मिली और वहां वह सामान्‍य जीवन जी रही है।
सुनीता जन्‍म से अंधी थी। यह अभिशाप तो उसे मिला ही था। उसके माता पिता ने उसे गांव के ही एक विकलांग से शादी करवा दिया (दूसरा अभिशाप) । इतना ही नहीं शादी के कुछ दिन बाद ही उसका विकलांग पति इस दुनियां को छोड कर चल पडा और वह विधवा हो गई (तीसरा अभिशाप )। तब तक ईश्‍वर ने अभिशाप का साथी बना दिया उसे। इसके बाद क्‍या था। पति मरने के बाद ससुराल वालों ने घर से निकाल दिया और कहा कि तुम अब किसी काम की नहीं हो। वह घर गई मां बाप ने भी उसे घर चढने नहीं दिया और बाहर से ही भगा दिया और कहा यहां क्‍यों आई हो तुम अपने ससुराल जाओ। उसने जब अपना दुखडा सुनाया तो माता पिता ने भी उसे बेकार की संज्ञा देकर उसे धर से निकाल दिया। वह भटकती फिरती रही। कहीं उसे किसी ने पनाह नहीं दी। लेकिन शायद भगवान ने इस बार उसकी सुन ली और वह नारायण आश्रम पहुंच गई। आज सुनीता अपनी जीवन जी रही है। सुनीता गर्भ से है। नारायण आश्रम के संरक्षक हरेराम पांडेय ने कहा कि गर्भ की स्थिति में इसका विशेष ख्‍याल रखा जाना चाहिए। और वह और उनकी पत्‍नी सुनीता का ख्‍याल रख भी रहे हैं। सुनीता खुश है।
/////////हमने पहले ही कहा था- ऐसी सुनीता का जन्‍म हमारे जैसे समाज में ही होता है। लेकिन उसे पनाह भी हमारे समाज के ही लोगों को देना होता है। हमें संकल्‍प लेना होगा बेटा-बेटी एक समान।

9/08/2009

एक सपना जो साकार नहीं हो सका

वर्ष 1947 में जब भारत आजाद हुआ था तो स्‍वतंत्रता संग्राम में भाग लेने वाले स्‍वतंत्रता सेनानियों ने ना जाने क्‍या क्‍या सपने देखे होंगे। उन्‍होंने सोचा होगा कि आजादी हासिल होने के बाद हम खुले वतन में सांस ले सकेंगे। सारी सुविधा हमें मिल पायेगी। लेकिन आज उसका ठीक उल्‍टा हो रहा है। स्‍वतंत्रता सेनानियों को अपना हक हासिल करने हेतु लड़ाई लड़नी पड़ रही है। पिछले दिनों हमारे शहर में स्‍वतंत्रता सेनानियों व उनके आश्रितों की एक बैठक आयोजित की गई। बैठक में उन्‍होंने कहा कि हम किसी भी समस्‍या का आवेदन लेकर प्रशासन के पास जाते हैं तो प्रशासन द्वारा हमारे आवेदनों को तरजीह नहीं दिया जाता है। ऐसा क्‍यों ------
जिन स्‍वतंत्रता सेनानियों के बदौलत देश आजाद हुआ। जो अपनी जान की फिकर किए बिना आजादी की लड़ाई में कूद गए थे। उनके साथ ऐसा सौतेलापन व्‍यवहार क्‍यों। आखिर सरकार और प्रशासन को कौन समझाए। सभी सत्‍ता के भूखे हैं। आज हर कोई नेता मुख्‍यमंत्री बनना चाह रहा है। हर प्रशासन के नुमाईंदे चाहते हैं कि हमारी भी एक बड़ी सी कोठी हो::::::हमारी भी दो तीन अच्‍छी अच्‍छी कारें हों::::: इन्‍हीं सोच और इन्‍हीं सोच को साकार करने में इनके समय कट जाते हैं। भला दूसरों की समस्‍या से इन्‍हें क्‍या लेना देना::::
नेताओं की बात तो मत ही कहिए तो बेहतर होगा:::: आज जो आपके वोट के बदौलत सत्‍ता पर काबिज हुए हैं ::::: वो कल पहचानेंगे तक नहीं :::: लेकिन एक बात है वोट लेने के समय वो आपके पास मिन्‍नतें मांगने जरूर जायेंगे::::
अब आप ही बतायें जिन्‍हें देश भक्ति से कोई लेना देना नहीं वो सत्‍ता पर बैठ कर क्‍या देश की सेवा कर पायेंगे::::
वो स्‍वतंत्रता सेनानियों को क्‍या सुविधा मुहैया करा पायेंगे::::::
वो जवान शहीदों को क्‍या दे सकते हैं:::::::::