शायद आपने एक शायरी सुनी होगी //// हमें तो अपनों ने लूटा गैरों में कहां दम था मेरी कस्ती थी डूबी वहां जहां पानी कम था///// शायद अंधी सुनीता के साथ भी ऐसा ही हुआ। उसे उसके मां बाप और बाद में ससुराल ने शराब की खाली बोतल की तरह खाली समझ कर घर से बाहर निकाल दिया। उस समय तो मानो सुनिता के सिर पर एक ही ठिकरा फोडा गया कि अब तुम बेकार हो चुकी हो। लेकिन आपने एक ऐसा भी गीत सुना होगा ////// जिसका कोई नहीं उसका तो खुदा होता है///// और सुनीता के साथ भी ऐसा ही हुआ। उसे हमारे शहर के एक आश्रम में पनाह मिली और वहां वह सामान्य जीवन जी रही है।
सुनीता जन्म से अंधी थी। यह अभिशाप तो उसे मिला ही था। उसके माता पिता ने उसे गांव के ही एक विकलांग से शादी करवा दिया (दूसरा अभिशाप) । इतना ही नहीं शादी के कुछ दिन बाद ही उसका विकलांग पति इस दुनियां को छोड कर चल पडा और वह विधवा हो गई (तीसरा अभिशाप )। तब तक ईश्वर ने अभिशाप का साथी बना दिया उसे। इसके बाद क्या था। पति मरने के बाद ससुराल वालों ने घर से निकाल दिया और कहा कि तुम अब किसी काम की नहीं हो। वह घर गई मां बाप ने भी उसे घर चढने नहीं दिया और बाहर से ही भगा दिया और कहा यहां क्यों आई हो तुम अपने ससुराल जाओ। उसने जब अपना दुखडा सुनाया तो माता पिता ने भी उसे बेकार की संज्ञा देकर उसे धर से निकाल दिया। वह भटकती फिरती रही। कहीं उसे किसी ने पनाह नहीं दी। लेकिन शायद भगवान ने इस बार उसकी सुन ली और वह नारायण आश्रम पहुंच गई। आज सुनीता अपनी जीवन जी रही है। सुनीता गर्भ से है। नारायण आश्रम के संरक्षक हरेराम पांडेय ने कहा कि गर्भ की स्थिति में इसका विशेष ख्याल रखा जाना चाहिए। और वह और उनकी पत्नी सुनीता का ख्याल रख भी रहे हैं। सुनीता खुश है।
/////////हमने पहले ही कहा था- ऐसी सुनीता का जन्म हमारे जैसे समाज में ही होता है। लेकिन उसे पनाह भी हमारे समाज के ही लोगों को देना होता है। हमें संकल्प लेना होगा बेटा-बेटी एक समान।

1 टिप्पणी:
संकल्प तो लेना ही होगा। संकल्प जिसमें विकल्प की गुंजाइश नहीं रहती है। सेवा करनी ही होगी। मानवता की रक्षा के लिए समाज की रक्षा के लिए और आने वाली पीढी को संदेश, प्रेरणा और ऐसा ही आचरण करने के लिए। लेखक ने जिस विषय को उठाया है वह प्रशंसा के योग्य है।
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