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3/07/2010

महिला दिवस

महिला दिवस : लोग समारोह आयोजित कर महिलाओं को जागृत करने का संकल्‍प तो लेते हैं लेकिन संकल्‍प सिर्फ समारोह तक ही सीमित रहता है। यह संकल्‍प समारोह स्‍थल से बाहर नहीं निकल पाता है। पहले हमारे द्वारा लिए गए संकल्‍प को और सशक्‍त बनाना होगा। तभी महिला सशक्तिकरण को सही अर्थ मिल सकता है। महिलाओं को सही दिशा मिल सकती है।
इन्‍हें देखिए:::: ये बच्‍ची फूटपाथ पर पापकार्न बनाने का काम कर रही है। लोग पांच रुपया दस रुपया देकर इसे खरीद कर ले जायेंगे। लेकिन उन्‍हें सशक्तिकरण से जोड़ने का कोई प्रयास नहीं करेंगे। ये बच्‍ची दिन भर में मुश्किल से पचास रुपया कमा पाती है। ऐसे में 10 सदस्‍यों वाला परिवार कैसे चल पायेगा। यह इसके लिए यक्ष प्रश्‍न है।

क्‍या कसूर था लक्ष्‍मण का

भुखमरी, यह शब्‍द सुन कर ही जेहन के लाखों करोड़ों रोंगटे खडे़ हो जाते हैं। आखिर लक्ष्‍मण ने ऐसी कौन सी खता की थी कि भुखमरी के कारण उसने काल को गले लगा लिया। लक्ष्‍मण मजदूर था, वह मजदूरी कर अपना और अपने परिवार का पेट पालता था। लेकिन महीनों तक काम नहीं मिलने के कारण वह बेकार घर में बैठा रहा। वह दूसरा और कोई काम भी नहीं कर सकता था जिससे उसे अर्थ की कमाई हो सके। बेकारी ने उसे भुखमरी के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया। अंतत: जीवन की लड़ाई में वह हार गया और काल के गाल में समा गया।
देवघर जिले के मोहनपुर प्रखंड की यह घटना है। लक्ष्‍मण नि:संतान था। रोज की कमाई उसके पेट भरने में मददगार थी लेकिन जब वह बेकार बैठ गया तो उसे खाने के लाले पड़ने लगे। कोई उसके मदद को नहीं आया। यहां कि गांव वाले भी नहीं। आखिर गांव वाले आते भी कैसे पूरे गांव में भीषण गरीबी है। वे अपना पेट पाले की लक्ष्‍मण का। इस उधेड़बुन में लोगों ने लक्ष्‍मण पर ध्‍यान नहीं दिया। आश्‍चर्य करें जिस लक्ष्‍मण के वोट से जन प्रतिनिधि चुने गए वह जन प्रतिनिधि भी उनके मदद को नहीं पहुंच पाये। प्रशासन की तो बात ही मत पूछिए उसे कोई बताये तो जान पाये नहीं बताये तो पूरी तरह अनजान रह जाये। प्रशासन व जन प्रतिनिधि की तंद्रा तब टूटी जब लक्ष्‍मण स्‍वर्ग सिधार चुका था। उसके देहावसान के बाद सभी उनकी मदद को आये;;;; इसे दुर्भाग्‍य नहीं कहेंगे तो और क्‍या। लेकिन अब पछतायत होत क्‍या जब चिडि़यां चुग गई खेत
ऐसे कई लक्ष्‍मण हैं जो भुख के कारण मौत को गले लगा रहे हैं। सरकार ने गरीबों के लिए कई योजनाएं चला रखे हैं। लेकिन यह योजनाएं सिर्फ लफ्फाजी साबित होती हैं। इन योजनाओं को जायज मुकाम तक पहुंचाने का बीड़ा उठाये प्रशासन के मुलाजिम ही योजनाओं को गटक जाते हैं।

आखिर जिनके लिए योजनाएं चलाई जा रही है उन तक क्‍यों नहीं पहुंच रही है यह एक बहुत बड़ा प्रश्‍न है। इसके लिए जिम्‍मेवार कौन है।