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8/27/2010

लेह का जलजला

लेह के जलजले ने सैकड़ों परिवार का चूल्‍हा ठंडा कर दिया। कई अनाथ हुए, कई महिलाएं असमय विधवा हो गयी, कई मां की गोदें सूनी हो गयी। सरकार ढि़ढोरा पीट कर कहती है मनरेगा के कारण मजदूर रोजी रोटी के लिए बाहर नहीं जा रहे। यदि उन मजदूरों को अपने गृहक्षेत्र में ही दाना पानी मिलता तो वे लेह क्‍यों जाते।
मेरा जिला छोटा है, यहां का जिला प्रशासन भी मनरेगा में अच्‍छे प्रदर्शन के लिए प्रधानमंत्री से सम्‍मान पुरस्‍कार ले कर आया है। यह सम्‍मान पुरस्‍कार शायद झूठा है। यदि मनरेगा की स्थिति अच्‍छी होती तो यहां के मजदूर लेह क्‍यों जाते। लेह के जलजले के कुछ दिनों के बाद से ही धीरे धीरे यह बात छन कर आ रही है कि यहां के मजदूर लेह में फंसे हुए हैं। उनका ना तो कोई अता पता चल रहा है ना ही वे ही कोई अता पता अपने परिवार का लगा रहे हैं। इसके बारे में अभी तक प्रशासन नहीं सोच रही है। उनका पता लगाना किसकी जिम्‍मेवारी है। यदि वो जिंदा हैं तो उन्‍हें घर लाने का काम कौन करेगा। यह जिला प्रशासन का काम है।
कोरे उपलब्धियों का बखान करने में सरकार व प्रशासन को जरा भी झिझक महसूस नहीं होती। शायद उनकी यह पुरानी बीमारी है। तो फिर विकास की बात तो बेमानी ही होगी। झारखंड तो भ्रष्‍टाचार का महासागर है। यहां के हर महकमों में भ्रष्‍टाचार चिपका है।
यह बात समझ में नहीं आती जो जनप्रतिनिधि जनता के बीच से चुने जाते हैं वो क्‍या कर रहे हैं। उन्‍हें क्‍या जब चुनाव आये बस जीत जायें यही उनका उद्देश्‍य होता है इसके बाद जनता को दाना पानी मिले या ना मिले इससे उन्‍हें क्‍या मतलब।
भोली जनता भी उनके लुभावने वादों में फंस जाते हैं। जिसका परिणाम यह होता है सब कुछ रहने पर भी अभाव की जिंदगी उनका साथी बन जाता है।

9/06/2009

कुछ दुसरो के लिए करें

मैं आज बाजार में घूम रहा था, रात के नौ बज रहे थे , एक पान दुकान पर अपने मित्रों के साथ पान खा रहा था तभी एक बच्चा आया और भोजन के लिए पॉँच रूपये मांगने लगा , दुकान वाले ने कहा चलो जाओ अभी नही है , मेरी नजर उस पर गई , हमने उसके चेहरे पर एक दर्द भरी सिकन देखी , हमने उससे कहा कहाँ रहते हो , उसने कहा की उसके माता और पिता कचरा चुनने का कम करते हैं और वह स्टेशन के पास झोपरेमें रहता है , दो दिन से पिता काम पर नही गए हैं जिस कारण घर में खाने को कुछ नही है , इसलिए मांगने निकल गए हैं , हमारे जेब में चालीस रूपये थे मैंने उसे तीस रूपये दे दिए , उसने धन्यवाद् दिया और बगल के दुकान से दस रोटी खरीद लिए........
दुसरे दिन हमने स्टेशन के पास उसे उसके बताये गए झोपरे में ही देखा .... इसका मतलब वह सही था ....... इसलिए अपने लिए तो सब करते हैं ... अपने बच्चो के लिए वस्त्र खरीदते है ..... खिलोने खरीदते है ....... चोकलेट खरीदते हैं ....... कभी आपने उन कुपोषित बच्चो की तरफ़ देखा है ...... उसे भी जीने का हक है ....... वो भी कई हसरत लिए जमी पर आया है ....... वो भी हमारी तरह जीना चाहता है .........
चलिए आज यह प्रण करते हैं कि हम अपने के साथ उन लोगो को भी जीने का हक दिलाएंगे जो चाह कर भी ठीक से जी नही पा रहे हैं ........