लेह के जलजले ने सैकड़ों परिवार का चूल्हा ठंडा कर दिया। कई अनाथ हुए, कई महिलाएं असमय विधवा हो गयी, कई मां की गोदें सूनी हो गयी। सरकार ढि़ढोरा पीट कर कहती है मनरेगा के कारण मजदूर रोजी रोटी के लिए बाहर नहीं जा रहे। यदि उन मजदूरों को अपने गृहक्षेत्र में ही दाना पानी मिलता तो वे लेह क्यों जाते।
मेरा जिला छोटा है, यहां का जिला प्रशासन भी मनरेगा में अच्छे प्रदर्शन के लिए प्रधानमंत्री से सम्मान पुरस्कार ले कर आया है। यह सम्मान पुरस्कार शायद झूठा है। यदि मनरेगा की स्थिति अच्छी होती तो यहां के मजदूर लेह क्यों जाते। लेह के जलजले के कुछ दिनों के बाद से ही धीरे धीरे यह बात छन कर आ रही है कि यहां के मजदूर लेह में फंसे हुए हैं। उनका ना तो कोई अता पता चल रहा है ना ही वे ही कोई अता पता अपने परिवार का लगा रहे हैं। इसके बारे में अभी तक प्रशासन नहीं सोच रही है। उनका पता लगाना किसकी जिम्मेवारी है। यदि वो जिंदा हैं तो उन्हें घर लाने का काम कौन करेगा। यह जिला प्रशासन का काम है।
कोरे उपलब्धियों का बखान करने में सरकार व प्रशासन को जरा भी झिझक महसूस नहीं होती। शायद उनकी यह पुरानी बीमारी है। तो फिर विकास की बात तो बेमानी ही होगी। झारखंड तो भ्रष्टाचार का महासागर है। यहां के हर महकमों में भ्रष्टाचार चिपका है।
यह बात समझ में नहीं आती जो जनप्रतिनिधि जनता के बीच से चुने जाते हैं वो क्या कर रहे हैं। उन्हें क्या जब चुनाव आये बस जीत जायें यही उनका उद्देश्य होता है इसके बाद जनता को दाना पानी मिले या ना मिले इससे उन्हें क्या मतलब।
भोली जनता भी उनके लुभावने वादों में फंस जाते हैं। जिसका परिणाम यह होता है सब कुछ रहने पर भी अभाव की जिंदगी उनका साथी बन जाता है।

1 टिप्पणी:
लेह में बादल फटा। दिल दहला देने वाला मंजर था। आदमी की कौन पूछे गांव के गांव मिट गये नामो निशान तक मिट गया। लेकिन अजय ने जो बात लेह के साथ उठाई है वो भी कम मार्मिक नहीं। अगर गरीबी का पहाड़ सिर पर नहीं टूट रहा था तो वे मजदूर गांव-घर छोड़कर लेह क्यों जाते?
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