आज बच्चों को भी अंग्रेजी शिक्षा पर जोर दिया जा रहा है। सत्ता में बैठे नेता भी अंग्रेजी को बढ़ावा दे रहे हैं। जिस अंग्रेजी हुकूमत को भगाने के लिए हमारे हजारों भारतीयों ने अपने जान की कुर्बानी दी उन्हीं को आत्मसात किया जा रहा है। आखिर ऐसा कब तक चलेगा। आज वो स्थिति हो गई है कि हिन्दी को आत्मसात करने वाले स्कूलों में बच्चों का दाखिला अभिभावक नहीं करा रहे हैं। उनसे पूछने पर वो कहते हैं कि उन स्कूलों में पढ़ाई अच्छी नहीं होती है। उनसे कई बार कहा गया कि स्कूल नहीं बच्चे पढ़ते हैं फिर भी अभिभावकों के समझ में नहीं आता । आखिर ऐसा क्यों! बच्चों को एक दो गिनती की जगह वन टू पढ़ाई जाती है।
एक घटना मेरे साथ भी घटी आप सुनेंगे तो हंसेंगे
एक दुकान में मैं किराने का सामान खरीद रहा था। उसी समय एक बच्चा आया। उसने दुकानदार से कहा अंकल वन केजी चीनी व चाय की पत्ती देना । दुकान वाले ने उसे एक किलो चीन व एक टाटा प्रीमियम ब्रांड वाली चाय की पत्ती उसे दे दी। बच्चे ने दुकान वाले से पूछा कितना हुआ । दुकान वाले ने कहा अड़तालीस रुपये हुए । बच्चे की समझ में अड़तालीस रुपये नहीं आये । बच्चे ने कहा अंकल अड़तालीस रुपये नहीं समझ पाया अंग्रेजी में बोलो । दुकान वाला पढ़ा लिखा था उसने बच्चे से मजाक में कहा ऐटी एट (88) रुपये हुए । बच्चे ने झट से 100 के नोट निकाल के दे दिए। मेरे नजर उस बच्चे पर गई । हमने कहा कि किस स्कूल में पढ़ते हो । उसने कहा जसीडीह संत फ्रांसिस स्कूल में । तभी दुकान दार ने कहा तुम हिन्दी में रुपये की भाषा नहीं समझोगे तो कोई भी तुमको ठग लेगा। बच्चा मुंह ताकता रह गया। हमने दुकान वाले से कहा तुम्हारा बच्चा कितना बड़ा है । उसने कहा 5 साल का। तुम्हारा बच्चा जब बड़ा होगा तो किस स्कूल में पढ़ाओगे । तो उसने कहा अभी यही स्कूल सबसे अच्छा है । तभी हमने कहा तुमने अभी तुरंत उस बच्चे को कहा था कि हिन्दी में रुपये की भाषा नहीं समझोगे तो कोई भी तुम्हें ठग लेगा। कल तुम्हारे बच्चे भी इसी भाषा को समझेंगे।
।।।।।।। हमारे कहने का मतलब यह नहीं है कि आप अच्छे स्कूल में बच्चे का नामांकन न कराएं ।।।।।। लेकिन बच्चों का नामांकन कराने के समय यह जरूर देखें कि विद्यालय में बच्चों को हिन्दी की शिक्षा दी जाती है कि नहीं । क्योंकि बच्चे देश के भविष्य होते हैं। हमेशा से हमने ऐसा कहा है । तो देश के भविष्य के खिलवाड़ के साथ देश की गरिमा को मिटाने का काम न करें।
क्योंकि हिन्दी हमारी अपनी भाषा है और कोई अपनों के साथ दगाबाजी करे यह क्या आपसे बर्दाश्त होगा। कतई नहीं। हिन्दी को आत्मसात करने की शिक्षा अपने बच्चों को जरूर दें। यह तभी संभव है जब हर अभिभावकों के मन में ऐसी बातें पैदा होगी। अभिभावकों को जागरूक होना होगा। यह तभी संभव है।
क्योंकि यदि पेड़ का जड़ मजबूत होगा तभी पेड़ फलेगा फुलेगा। जब जड़ ही मजबूत नहीं होगा तो अच्छे तना व अच्छे फल की कामना हम कतई नहीं कर सकते।
जय हो
