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2/16/2010

सहायता

निरंजन पढ़ा लिखा इंसान है। वह नौकरी करना चाहता है। अपनी कमाई से अपने मां बाप की सेवा करना चाहता है। लेकिन चाह कर भी वह असमर्थ है। क्‍योंकि उसकी सांसें चल रही है तो सिर्फ ईश्‍वर की कृपा से। निरंजन की दोनों किडनी खराब हो चुकी है। परिवार के पास उतने अर्थ नहीं हैं जिससे निरंजन का इलाज करवा सके। उसके इलाज में करीब 8 लाख रुपये का खर्च आयेगा। दो दिन यहां के अखबारों में खबर छपी :::: निरंजन जीना चाहता है:::: लोग उसकी मदद को खड़े हुए। यहां के समाज सेवी उसकी मदद को आगे आये।
16 फरवरी दिन के 3 बजे थे। टावर चौक पर कुछ प्रबुद्ध लोग लोगों के जूता पालिस कर रहे थे। पूछने पर पता चला कि सभी निरंजन के इलाज के लिए चंदा इकट्ठा कर रहे हैं। समाज सेवा की यह भावना देख किसी का भी मन पसीज सकता है। कईयों ने इसके लिए हजारों रुपये दिये। लेकिन यहां तो लाखों की जरूरत है। चलिए जो भी हो सेवा की भावना तो जगी। अब आगे की रणनीति है भीक्षाटन। अब शायद निरंजन का इलाज हो पाये। यहां इलाज की जल्‍दीबाजी भी है। निरंजन के पिता नहीं हैं। उसका बड़ा भाई पारा शिक्षक है। अब आप ही सोच सकते हैं कि घर की माली हालत क्‍या होगी।
:::::::: समाज में निरंजन जैसे कई लोग हैं जो अर्थ के अभाव में इलाज नहीं करवा पा रहे हैं और काल के गाल में समाते जा रहे हैं। सेवा की भावना मन में जगानी होगी।
समाज में कई लोग ऐसे हैं जो गरीबों व लाचारों की मदद में काम आ सकते हैं। मन में सेवा का संकल्‍प लेना होगा। मानव मानव के बारे में नहीं सोचेगा तो कौन सोचेगा।