वर्ष 1947 में जब भारत आजाद हुआ था तो स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने वाले स्वतंत्रता सेनानियों ने ना जाने क्या क्या सपने देखे होंगे। उन्होंने सोचा होगा कि आजादी हासिल होने के बाद हम खुले वतन में सांस ले सकेंगे। सारी सुविधा हमें मिल पायेगी। लेकिन आज उसका ठीक उल्टा हो रहा है। स्वतंत्रता सेनानियों को अपना हक हासिल करने हेतु लड़ाई लड़नी पड़ रही है। पिछले दिनों हमारे शहर में स्वतंत्रता सेनानियों व उनके आश्रितों की एक बैठक आयोजित की गई। बैठक में उन्होंने कहा कि हम किसी भी समस्या का आवेदन लेकर प्रशासन के पास जाते हैं तो प्रशासन द्वारा हमारे आवेदनों को तरजीह नहीं दिया जाता है। ऐसा क्यों ------
जिन स्वतंत्रता सेनानियों के बदौलत देश आजाद हुआ। जो अपनी जान की फिकर किए बिना आजादी की लड़ाई में कूद गए थे। उनके साथ ऐसा सौतेलापन व्यवहार क्यों। आखिर सरकार और प्रशासन को कौन समझाए। सभी सत्ता के भूखे हैं। आज हर कोई नेता मुख्यमंत्री बनना चाह रहा है। हर प्रशासन के नुमाईंदे चाहते हैं कि हमारी भी एक बड़ी सी कोठी हो::::::हमारी भी दो तीन अच्छी अच्छी कारें हों::::: इन्हीं सोच और इन्हीं सोच को साकार करने में इनके समय कट जाते हैं। भला दूसरों की समस्या से इन्हें क्या लेना देना::::
नेताओं की बात तो मत ही कहिए तो बेहतर होगा:::: आज जो आपके वोट के बदौलत सत्ता पर काबिज हुए हैं ::::: वो कल पहचानेंगे तक नहीं :::: लेकिन एक बात है वोट लेने के समय वो आपके पास मिन्नतें मांगने जरूर जायेंगे::::
अब आप ही बतायें जिन्हें देश भक्ति से कोई लेना देना नहीं वो सत्ता पर बैठ कर क्या देश की सेवा कर पायेंगे::::
वो स्वतंत्रता सेनानियों को क्या सुविधा मुहैया करा पायेंगे::::::
वो जवान शहीदों को क्या दे सकते हैं:::::::::
प्रिय बंधुओं संकल्प मनुष्य के जीवन में एक नया बदलाव ला सकता है। जब तक हम संकल्पित नहीं होंगे तब तक हम अपने जायज मुकाम तक नहीं पहुंच सकते।
9/08/2009
9/06/2009
कुछ दुसरो के लिए करें
मैं आज बाजार में घूम रहा था, रात के नौ बज रहे थे , एक पान दुकान पर अपने मित्रों के साथ पान खा रहा था तभी एक बच्चा आया और भोजन के लिए पॉँच रूपये मांगने लगा , दुकान वाले ने कहा चलो जाओ अभी नही है , मेरी नजर उस पर गई , हमने उसके चेहरे पर एक दर्द भरी सिकन देखी , हमने उससे कहा कहाँ रहते हो , उसने कहा की उसके माता और पिता कचरा चुनने का कम करते हैं और वह स्टेशन के पास झोपरेमें रहता है , दो दिन से पिता काम पर नही गए हैं जिस कारण घर में खाने को कुछ नही है , इसलिए मांगने निकल गए हैं , हमारे जेब में चालीस रूपये थे मैंने उसे तीस रूपये दे दिए , उसने धन्यवाद् दिया और बगल के दुकान से दस रोटी खरीद लिए........
दुसरे दिन हमने स्टेशन के पास उसे उसके बताये गए झोपरे में ही देखा .... इसका मतलब वह सही था ....... इसलिए अपने लिए तो सब करते हैं ... अपने बच्चो के लिए वस्त्र खरीदते है ..... खिलोने खरीदते है ....... चोकलेट खरीदते हैं ....... कभी आपने उन कुपोषित बच्चो की तरफ़ देखा है ...... उसे भी जीने का हक है ....... वो भी कई हसरत लिए जमी पर आया है ....... वो भी हमारी तरह जीना चाहता है .........
चलिए आज यह प्रण करते हैं कि हम अपने के साथ उन लोगो को भी जीने का हक दिलाएंगे जो चाह कर भी ठीक से जी नही पा रहे हैं ........
दुसरे दिन हमने स्टेशन के पास उसे उसके बताये गए झोपरे में ही देखा .... इसका मतलब वह सही था ....... इसलिए अपने लिए तो सब करते हैं ... अपने बच्चो के लिए वस्त्र खरीदते है ..... खिलोने खरीदते है ....... चोकलेट खरीदते हैं ....... कभी आपने उन कुपोषित बच्चो की तरफ़ देखा है ...... उसे भी जीने का हक है ....... वो भी कई हसरत लिए जमी पर आया है ....... वो भी हमारी तरह जीना चाहता है .........
चलिए आज यह प्रण करते हैं कि हम अपने के साथ उन लोगो को भी जीने का हक दिलाएंगे जो चाह कर भी ठीक से जी नही पा रहे हैं ........
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