ना तो तपती दोपहर
ना तो कड़ाके की ठंड का कहर
ना तो बरसात
इन्हें किसी का डर नहीं है। इन्हें तो सिर्फ अपना और अपने माता पिता का पेट भरने की फिकर रहती है। बच्चों को भगवान का रूप कहा गया है, क्या आप भगवान को बर्तन धोने कहेंगे, क्या आप भगवान को अपनी साईकिल ठीक करने कहेंगे, क्या आप भगवान को खेत में मजदूरी कहेंगे।
तो फिर इन बच्चों से काम क्यों लिया जा रहा है। इन्हें भी जीवन जीने का हक है।
पिछले दिनों हमारे शहर में पल्स पोलियो अभियान के मद्देनजर प्रभात फेरी निकाली गई थी। जिसमें शहर के सभी विद्यालयों के बच्चे ने अपनी भागीदारी निभाई थी। स्थानीय टावर चौक पर जब रैली मुड़ी तो बगल में एक बच्चा आईसक्रीम बेच रहा था। वह बच्चा रैली को इतनी गहरी निगाहों से देख रहा था मानो उसके मन में कुछ उथल पुथल हो रहा हो। शायद वह सोच रहा था मैं भी इस रैली में काश शामिल हो पाता। मेरी नजर रैली के बदले उसपर जा टिकी थी। मैं उसके नजदीक गया और उसके चेहरे को पढ़ने लगा। मुझसे रहा नहीं गया। मैंने पूछा क्या सोच रहे हो बाबू। उसने कहा कुछ तो नहीं भैया। हमने फिर प्यार से पूछा-----नहीं कुछ तो जरूर सोच रहे हो। उसने मुस्कुराते हुए कहा क्या कहूं भैया आपको आईसक्रीम चाहिए क्या। मैंने कहा दे दो। मैंने उसकी एक आईसक्रीम खरीद ली। खाने लगा और उससे बातें भी करता रहा। वह भी स्कूल जाना चाहता था। लेकिन वह पेट की आग बुझाये या स्कूल जाये। इन छिजित बच्चों के लिए आखिर सरकार क्या कर रही है। सिर्फ घोषणाएं या और कुछ।
ये तस्वीर उन लाचार बच्चों की है जो चाह कर भी स्कूल नहीं जा पाते हैं। शायद उसे किसी ने प्रेरित भी नहीं किया। सिर्फ उससे काम लेना जानते हैं। काम के हिसाब से मजदूरी भी नहीं देते हैं। महीने भर काम करवाने के एवज में 200 से 300 रुपये देते हैं। आखिर यह कहां का न्याय है। सरकार का श्रम विभाग भी कुंभकरण की निद्रा में सोया हुआ है। आखिर इसका निदान कौन करेगा।
यह तभी संभव है, जब हम जागरूक होंगे। हमारा समाज जागरूक होगा। हमें संकल्प लेना होगा।



1 टिप्पणी:
यह आलेख असाधारण है। संचयन, लेखन और समायोजन की दृष्टि से काफी सबल है और बड़ा ही मार्मिक प्रभाव डालने वाला है। इसमें लगे चित्रों के अलावे भी लेखक ने शब्दों के माध्यम से ऐसा चित्र प्रस्तुत किया है जिससे सारी परिस्थियों का साफ पता चल जाता है।
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