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2/19/2010

बच्‍चे भगवान का रूप होते हैं


ना तो तपती दोपहर
ना तो कड़ाके की ठंड का कहर
ना तो बरसात
इन्‍हें किसी का डर नहीं है। इन्‍हें तो सिर्फ अपना और अपने माता पिता का पेट भरने की फिकर रहती है। बच्‍चों को भगवान का रूप कहा गया है, क्‍या आप भगवान को बर्तन धोने कहेंगे, क्‍या आप भगवान को अपनी साईकिल ठीक करने कहेंगे, क्‍या आप भगवान को खेत में मजदूरी कहेंगे।
तो फिर इन बच्‍चों से काम क्‍यों लिया जा रहा है। इन्‍हें भी जीवन जीने का हक है।
पिछले दिनों हमारे शहर में पल्‍स पोलियो अभियान के मद्देनजर प्रभात फेरी निकाली गई थी। जिसमें शहर के सभी विद्यालयों के बच्‍चे ने अपनी भागीदारी निभाई थी। स्‍थानीय टावर चौक पर जब रैली मुड़ी तो बगल में एक बच्‍चा आईसक्रीम बेच रहा था। वह बच्‍चा रैली को इतनी गहरी निगाहों से देख रहा था मानो उसके मन में कुछ उथल पुथल हो रहा हो। शायद वह सोच रहा था मैं भी इस रैली में काश शामिल हो पाता। मेरी नजर रैली के बदले उसपर जा टिकी थी। मैं उसके नजदीक गया और उसके चेहरे को पढ़ने लगा। मुझसे रहा नहीं गया। मैंने पूछा क्‍या सोच रहे हो बाबू। उसने कहा कुछ तो नहीं भैया। हमने फिर प्‍यार से पूछा-----नहीं कुछ तो जरूर सोच रहे हो। उसने मुस्‍कुराते हुए कहा क्‍या कहूं भैया आपको आईसक्रीम चाहिए क्‍या। मैंने कहा दे दो। मैंने उसकी एक आईसक्रीम खरीद ली। खाने लगा और उससे बातें भी करता रहा। वह भी स्‍कूल जाना चाहता था। लेकिन वह पेट की आग बुझाये या स्‍कूल जाये। इन छिजित बच्‍चों के लिए आखिर सरकार क्‍या कर रही है। सिर्फ घोषणाएं या और कुछ।
ये तस्‍वीर उन लाचार बच्‍चों की है जो चाह कर भी स्‍कूल नहीं जा पाते हैं। शायद उसे किसी ने प्रेरित भी नहीं किया। सिर्फ उससे काम लेना जानते हैं। काम के हिसाब से मजदूरी भी नहीं देते हैं। महीने भर काम करवाने के एवज में 200 से 300 रुपये देते हैं। आखिर यह कहां का न्‍याय है। सरकार का श्रम विभाग भी कुंभकरण की निद्रा में सोया हुआ है। आखिर इसका निदान कौन करेगा।
यह तभी संभव है, जब हम जागरूक होंगे। हमारा समाज जागरूक होगा। हमें संकल्‍प लेना होगा।

2/17/2010

संकल्‍प: जरूरत

संकल्‍प: जरूरत

जरूरत

संगीता का पति झालु ठेला चलाने का काम करता है। दिन भर जद्दोजहद के बाद किसी तरह 60 से 70  रुपया कमा लेता है। झालु शराब का आदी है। अपनी कमाई का आधा हिस्‍सा वह शराब पीने में गंवा देता है। बांकी के बचे पैसे वह संगीता को देता है। संगीता उन पैसों में 8 से 10 रुपया रोज बचाती है। ताकि महीने का मकान भाड़ा दिया जा सके। बांकी के पैसे से घर का खाना चलता है। यहां अंदाजा लगाया जा सकता है कि रोज 20 से 25 रुपया का खाना घर में आता है। कमरतोड़ महंगाई में उसके घर में क्‍या बनता होगा यह कहने की बात नहीं है। किसी तरह अपने और अपने बच्‍चों का पेट भर लेती है। संगीता को अपने पेट से ज्‍यादा जवान हो रही बेटी की चिंता है। इतनी कमाई में पेट तो किसी तरह भर जाता है। लेकिन बेटी की शादी कैसे होगी।
वह अपना दुख किसे सुनाये । दुर्भाय से वह गूंगी है। शायद झालू भी घर की परेशानी व दिन भर की मेहनत के कारण थक हार कर शराब को अपना साथी बना लिया है।
ऐसी बात नहीं है कि झालु इस बात को नहीं समझता है। वह भी इस बात को समझता है और बोलते बोलते फफक कर रो पड़ता है। झालु आखिर करें तो क्‍या करें। घर की माली हालत ठीक नहीं होने के कारण वह पढ़ भी नहीं पाया। किसी तरह दो अक्षर अपना नाम लिख लेता है।
सूर्य निकलते ही झालू ठेला लेकर निकल पड़ता है। गूंगी संगीता भी अपने बच्‍चों को छोड़कर दूसरे के घर बर्तन बासन धोने चली जाती है। दूसरों के घर से लाये भोजन और झालू की कमाई से बने भोजन को वह अपने बच्‍चों के बीच बांट देती है। जो बचता है अपना और झालू का पेट भर लेती है।
उसका भाडे़ का घर भी टूटे फूटे खपरैल का है।
झालू ने कहा कि कई नेताओं से अपने उद्धार की बात कही। लेकिन कोई नहीं उनकी बात सुनता थक हार कर अपनी बदहाली का जीवन को अपना साथी बना लिया है। बेटी की शादी की बात पर वह कहता है कि अब ईश्‍वर ही उसकी बेटी की शादी करायेगा।
यहां गौर करने वाली बात यह है कि हमारे नेता अपने आप को जनता का सेवक कहते हैं। लेकिन सेवा करने में पीछे हो जाते हैं। गरीबों के पैसे को अपने झोली में डाल लेते हैं। यहां तक कि प्रशासन ने भी कभी ध्‍यान नहीं दिया। न तो उसे इंदिरा आवास मिला, ना लाल कार्ड, मिली उसे क्‍या तो सिर्फ दुख भरी जिंदगी।
ऐसे कितने झालू मिलेंगे हमारे समाज में। कौन इनकी खैरियत सोचेगा। कौन इनके उद्धार को आगे आयेगा। यह एक यक्ष प्रश्‍न है।
ऐसे लोगों का उद्धार हो सकता है। बशर्ते की हमारे नेता अपनी मानसिकता बदल लें। प्रशासन अपने कर्तव्‍यों पर खरा उतरे। समाज के अमीर लोग अपने साथ साथ इनके बारे में भी सोचें।
तो शायद इनका उद्धार हो सकता है। लेकिन यह तभी संभव है जब हम संकल्‍प लेंगे। इसके लिए हमें ही आगे आना होगा। हमें ही अपने मन में संकल्‍प की भावना जगानी होगी।

2/16/2010

सहायता

निरंजन पढ़ा लिखा इंसान है। वह नौकरी करना चाहता है। अपनी कमाई से अपने मां बाप की सेवा करना चाहता है। लेकिन चाह कर भी वह असमर्थ है। क्‍योंकि उसकी सांसें चल रही है तो सिर्फ ईश्‍वर की कृपा से। निरंजन की दोनों किडनी खराब हो चुकी है। परिवार के पास उतने अर्थ नहीं हैं जिससे निरंजन का इलाज करवा सके। उसके इलाज में करीब 8 लाख रुपये का खर्च आयेगा। दो दिन यहां के अखबारों में खबर छपी :::: निरंजन जीना चाहता है:::: लोग उसकी मदद को खड़े हुए। यहां के समाज सेवी उसकी मदद को आगे आये।
16 फरवरी दिन के 3 बजे थे। टावर चौक पर कुछ प्रबुद्ध लोग लोगों के जूता पालिस कर रहे थे। पूछने पर पता चला कि सभी निरंजन के इलाज के लिए चंदा इकट्ठा कर रहे हैं। समाज सेवा की यह भावना देख किसी का भी मन पसीज सकता है। कईयों ने इसके लिए हजारों रुपये दिये। लेकिन यहां तो लाखों की जरूरत है। चलिए जो भी हो सेवा की भावना तो जगी। अब आगे की रणनीति है भीक्षाटन। अब शायद निरंजन का इलाज हो पाये। यहां इलाज की जल्‍दीबाजी भी है। निरंजन के पिता नहीं हैं। उसका बड़ा भाई पारा शिक्षक है। अब आप ही सोच सकते हैं कि घर की माली हालत क्‍या होगी।
:::::::: समाज में निरंजन जैसे कई लोग हैं जो अर्थ के अभाव में इलाज नहीं करवा पा रहे हैं और काल के गाल में समाते जा रहे हैं। सेवा की भावना मन में जगानी होगी।
समाज में कई लोग ऐसे हैं जो गरीबों व लाचारों की मदद में काम आ सकते हैं। मन में सेवा का संकल्‍प लेना होगा। मानव मानव के बारे में नहीं सोचेगा तो कौन सोचेगा।

2/15/2010

संकल्‍प: क्‍या होगा हमारी संस्‍कृति का

संकल्‍प: क्‍या होगा हमारी संस्‍कृति का

क्‍या होगा हमारी संस्‍कृति का

वेलेनटाईन डे
आखिर क्‍या है वेलेनटाईन डे। हमने एक व्‍यक्ति से यह प्रश्‍न किया। उसने जवाब दिया। अपने प्रेयशी को गिफ्ट देने का दिन है वेलेनटाईन डे। हमने फिर एक प्रश्‍न दागा। ऐसी क्‍या बात है कि लोग आज ही के दिन अपने प्रेयशी को गिफ्ट देते हैं। वह व्‍यक्ति चुप हो गया। उसके पास कोई जवाब नहीं थे। तब हमने कहा। आप नहीं जानते हैं मैं बताता हूं आपको क्‍या है वेलेनटाईन डे।
हमने कहा जानते हैं जिस अंग्रेजों को भगाने के लिए हमारे देश के क्रांतिकारियों ने अपने प्राण गंवा दिये उसी अंग्रेज के जन्‍म दिन को वेलेनटाईन डे के रूप में मनाते हैं। वह व्‍यक्ति बोला ऐसी बात है तो हम कभी नहीं वेलेनटाईन डे मनायेंगे।
यही बात है जो लोग वेलेनटाईन डे मनाते हैं। शायद वह भारतीय कहलाने लायक नहीं हैं। हम क्‍यों अंग्रेज के जन्‍म दिन को मनायें।
मेरा शहर है तो बहुत छोटा  लेकिन है बड़ा रमणीक स्‍थल। मेरे शहर के आसपास प्रकृति का सौंदर्य बिखेरने वाले दर्जनों पहाड़ पर्वत हैं। मैं वेलेनटाईन डे के दिन घूमने निकला। मेरे शहर से 2 किमी की दूरी पर एक छोटा सा पहाड़ है नंदन पहाड़। वहां हमने देखा कई जोड़े छुप छुप कर बैठे हुए थे। आखिर क्‍यों भाई। वेलेनटाईन डे स्‍पेशल क्‍यों। कई दिन हमारे समाज में हैं। पत्नियां अपने पति की सलामती के लिए कई कठिन से कठिन व्रत रखती हैं। वो रखो। वेलेनटाईन डे क्‍यों।
आखिर इन्‍हें समझाये कौन। ऐसा करने वाले के मां बाप भी तो इसी संस्‍कृति में चलने की चेष्‍टा करते हैं। पता नहीं हमारी संस्‍कृति का क्‍या होगा।
 लोगों को इसके बारे में सोचना होगा।
इसके लिए लोगों को आगे आना होगा।
यह तभी संभव है जब हम और आप जागृत होंगे। बिना जागृति के कोई कार्य संपन्‍न नहीं हो सकता। वह अधूरा ही रह जायेगा। अंग्रेजी संस्‍कृति को छोड़ना होगा। इसके लिए हमें संकल्‍प लेना होगा।
जय भारत
जय हिन्‍दुस्‍तान
जय हिन्‍दी
जय हो।।।।।