वेलेनटाईन डे
आखिर क्या है वेलेनटाईन डे। हमने एक व्यक्ति से यह प्रश्न किया। उसने जवाब दिया। अपने प्रेयशी को गिफ्ट देने का दिन है वेलेनटाईन डे। हमने फिर एक प्रश्न दागा। ऐसी क्या बात है कि लोग आज ही के दिन अपने प्रेयशी को गिफ्ट देते हैं। वह व्यक्ति चुप हो गया। उसके पास कोई जवाब नहीं थे। तब हमने कहा। आप नहीं जानते हैं मैं बताता हूं आपको क्या है वेलेनटाईन डे।
हमने कहा जानते हैं जिस अंग्रेजों को भगाने के लिए हमारे देश के क्रांतिकारियों ने अपने प्राण गंवा दिये उसी अंग्रेज के जन्म दिन को वेलेनटाईन डे के रूप में मनाते हैं। वह व्यक्ति बोला ऐसी बात है तो हम कभी नहीं वेलेनटाईन डे मनायेंगे।
यही बात है जो लोग वेलेनटाईन डे मनाते हैं। शायद वह भारतीय कहलाने लायक नहीं हैं। हम क्यों अंग्रेज के जन्म दिन को मनायें।
मेरा शहर है तो बहुत छोटा लेकिन है बड़ा रमणीक स्थल। मेरे शहर के आसपास प्रकृति का सौंदर्य बिखेरने वाले दर्जनों पहाड़ पर्वत हैं। मैं वेलेनटाईन डे के दिन घूमने निकला। मेरे शहर से 2 किमी की दूरी पर एक छोटा सा पहाड़ है नंदन पहाड़। वहां हमने देखा कई जोड़े छुप छुप कर बैठे हुए थे। आखिर क्यों भाई। वेलेनटाईन डे स्पेशल क्यों। कई दिन हमारे समाज में हैं। पत्नियां अपने पति की सलामती के लिए कई कठिन से कठिन व्रत रखती हैं। वो रखो। वेलेनटाईन डे क्यों।
आखिर इन्हें समझाये कौन। ऐसा करने वाले के मां बाप भी तो इसी संस्कृति में चलने की चेष्टा करते हैं। पता नहीं हमारी संस्कृति का क्या होगा।
लोगों को इसके बारे में सोचना होगा।
इसके लिए लोगों को आगे आना होगा।
यह तभी संभव है जब हम और आप जागृत होंगे। बिना जागृति के कोई कार्य संपन्न नहीं हो सकता। वह अधूरा ही रह जायेगा। अंग्रेजी संस्कृति को छोड़ना होगा। इसके लिए हमें संकल्प लेना होगा।
जय भारत
जय हिन्दुस्तान
जय हिन्दी
जय हो।।।।।
प्रिय बंधुओं संकल्प मनुष्य के जीवन में एक नया बदलाव ला सकता है। जब तक हम संकल्पित नहीं होंगे तब तक हम अपने जायज मुकाम तक नहीं पहुंच सकते।
2/15/2010
12/19/2009
पनाह
शायद आपने एक शायरी सुनी होगी //// हमें तो अपनों ने लूटा गैरों में कहां दम था मेरी कस्ती थी डूबी वहां जहां पानी कम था///// शायद अंधी सुनीता के साथ भी ऐसा ही हुआ। उसे उसके मां बाप और बाद में ससुराल ने शराब की खाली बोतल की तरह खाली समझ कर घर से बाहर निकाल दिया। उस समय तो मानो सुनिता के सिर पर एक ही ठिकरा फोडा गया कि अब तुम बेकार हो चुकी हो। लेकिन आपने एक ऐसा भी गीत सुना होगा ////// जिसका कोई नहीं उसका तो खुदा होता है///// और सुनीता के साथ भी ऐसा ही हुआ। उसे हमारे शहर के एक आश्रम में पनाह मिली और वहां वह सामान्य जीवन जी रही है।
सुनीता जन्म से अंधी थी। यह अभिशाप तो उसे मिला ही था। उसके माता पिता ने उसे गांव के ही एक विकलांग से शादी करवा दिया (दूसरा अभिशाप) । इतना ही नहीं शादी के कुछ दिन बाद ही उसका विकलांग पति इस दुनियां को छोड कर चल पडा और वह विधवा हो गई (तीसरा अभिशाप )। तब तक ईश्वर ने अभिशाप का साथी बना दिया उसे। इसके बाद क्या था। पति मरने के बाद ससुराल वालों ने घर से निकाल दिया और कहा कि तुम अब किसी काम की नहीं हो। वह घर गई मां बाप ने भी उसे घर चढने नहीं दिया और बाहर से ही भगा दिया और कहा यहां क्यों आई हो तुम अपने ससुराल जाओ। उसने जब अपना दुखडा सुनाया तो माता पिता ने भी उसे बेकार की संज्ञा देकर उसे धर से निकाल दिया। वह भटकती फिरती रही। कहीं उसे किसी ने पनाह नहीं दी। लेकिन शायद भगवान ने इस बार उसकी सुन ली और वह नारायण आश्रम पहुंच गई। आज सुनीता अपनी जीवन जी रही है। सुनीता गर्भ से है। नारायण आश्रम के संरक्षक हरेराम पांडेय ने कहा कि गर्भ की स्थिति में इसका विशेष ख्याल रखा जाना चाहिए। और वह और उनकी पत्नी सुनीता का ख्याल रख भी रहे हैं। सुनीता खुश है।
/////////हमने पहले ही कहा था- ऐसी सुनीता का जन्म हमारे जैसे समाज में ही होता है। लेकिन उसे पनाह भी हमारे समाज के ही लोगों को देना होता है। हमें संकल्प लेना होगा बेटा-बेटी एक समान।
सुनीता जन्म से अंधी थी। यह अभिशाप तो उसे मिला ही था। उसके माता पिता ने उसे गांव के ही एक विकलांग से शादी करवा दिया (दूसरा अभिशाप) । इतना ही नहीं शादी के कुछ दिन बाद ही उसका विकलांग पति इस दुनियां को छोड कर चल पडा और वह विधवा हो गई (तीसरा अभिशाप )। तब तक ईश्वर ने अभिशाप का साथी बना दिया उसे। इसके बाद क्या था। पति मरने के बाद ससुराल वालों ने घर से निकाल दिया और कहा कि तुम अब किसी काम की नहीं हो। वह घर गई मां बाप ने भी उसे घर चढने नहीं दिया और बाहर से ही भगा दिया और कहा यहां क्यों आई हो तुम अपने ससुराल जाओ। उसने जब अपना दुखडा सुनाया तो माता पिता ने भी उसे बेकार की संज्ञा देकर उसे धर से निकाल दिया। वह भटकती फिरती रही। कहीं उसे किसी ने पनाह नहीं दी। लेकिन शायद भगवान ने इस बार उसकी सुन ली और वह नारायण आश्रम पहुंच गई। आज सुनीता अपनी जीवन जी रही है। सुनीता गर्भ से है। नारायण आश्रम के संरक्षक हरेराम पांडेय ने कहा कि गर्भ की स्थिति में इसका विशेष ख्याल रखा जाना चाहिए। और वह और उनकी पत्नी सुनीता का ख्याल रख भी रहे हैं। सुनीता खुश है।
/////////हमने पहले ही कहा था- ऐसी सुनीता का जन्म हमारे जैसे समाज में ही होता है। लेकिन उसे पनाह भी हमारे समाज के ही लोगों को देना होता है। हमें संकल्प लेना होगा बेटा-बेटी एक समान।
9/14/2009
9/09/2009
हिन्दी को आत्मसात करें
आज बच्चों को भी अंग्रेजी शिक्षा पर जोर दिया जा रहा है। सत्ता में बैठे नेता भी अंग्रेजी को बढ़ावा दे रहे हैं। जिस अंग्रेजी हुकूमत को भगाने के लिए हमारे हजारों भारतीयों ने अपने जान की कुर्बानी दी उन्हीं को आत्मसात किया जा रहा है। आखिर ऐसा कब तक चलेगा। आज वो स्थिति हो गई है कि हिन्दी को आत्मसात करने वाले स्कूलों में बच्चों का दाखिला अभिभावक नहीं करा रहे हैं। उनसे पूछने पर वो कहते हैं कि उन स्कूलों में पढ़ाई अच्छी नहीं होती है। उनसे कई बार कहा गया कि स्कूल नहीं बच्चे पढ़ते हैं फिर भी अभिभावकों के समझ में नहीं आता । आखिर ऐसा क्यों! बच्चों को एक दो गिनती की जगह वन टू पढ़ाई जाती है।
एक घटना मेरे साथ भी घटी आप सुनेंगे तो हंसेंगे
एक दुकान में मैं किराने का सामान खरीद रहा था। उसी समय एक बच्चा आया। उसने दुकानदार से कहा अंकल वन केजी चीनी व चाय की पत्ती देना । दुकान वाले ने उसे एक किलो चीन व एक टाटा प्रीमियम ब्रांड वाली चाय की पत्ती उसे दे दी। बच्चे ने दुकान वाले से पूछा कितना हुआ । दुकान वाले ने कहा अड़तालीस रुपये हुए । बच्चे की समझ में अड़तालीस रुपये नहीं आये । बच्चे ने कहा अंकल अड़तालीस रुपये नहीं समझ पाया अंग्रेजी में बोलो । दुकान वाला पढ़ा लिखा था उसने बच्चे से मजाक में कहा ऐटी एट (88) रुपये हुए । बच्चे ने झट से 100 के नोट निकाल के दे दिए। मेरे नजर उस बच्चे पर गई । हमने कहा कि किस स्कूल में पढ़ते हो । उसने कहा जसीडीह संत फ्रांसिस स्कूल में । तभी दुकान दार ने कहा तुम हिन्दी में रुपये की भाषा नहीं समझोगे तो कोई भी तुमको ठग लेगा। बच्चा मुंह ताकता रह गया। हमने दुकान वाले से कहा तुम्हारा बच्चा कितना बड़ा है । उसने कहा 5 साल का। तुम्हारा बच्चा जब बड़ा होगा तो किस स्कूल में पढ़ाओगे । तो उसने कहा अभी यही स्कूल सबसे अच्छा है । तभी हमने कहा तुमने अभी तुरंत उस बच्चे को कहा था कि हिन्दी में रुपये की भाषा नहीं समझोगे तो कोई भी तुम्हें ठग लेगा। कल तुम्हारे बच्चे भी इसी भाषा को समझेंगे।
।।।।।।। हमारे कहने का मतलब यह नहीं है कि आप अच्छे स्कूल में बच्चे का नामांकन न कराएं ।।।।।। लेकिन बच्चों का नामांकन कराने के समय यह जरूर देखें कि विद्यालय में बच्चों को हिन्दी की शिक्षा दी जाती है कि नहीं । क्योंकि बच्चे देश के भविष्य होते हैं। हमेशा से हमने ऐसा कहा है । तो देश के भविष्य के खिलवाड़ के साथ देश की गरिमा को मिटाने का काम न करें।
क्योंकि हिन्दी हमारी अपनी भाषा है और कोई अपनों के साथ दगाबाजी करे यह क्या आपसे बर्दाश्त होगा। कतई नहीं। हिन्दी को आत्मसात करने की शिक्षा अपने बच्चों को जरूर दें। यह तभी संभव है जब हर अभिभावकों के मन में ऐसी बातें पैदा होगी। अभिभावकों को जागरूक होना होगा। यह तभी संभव है।
क्योंकि यदि पेड़ का जड़ मजबूत होगा तभी पेड़ फलेगा फुलेगा। जब जड़ ही मजबूत नहीं होगा तो अच्छे तना व अच्छे फल की कामना हम कतई नहीं कर सकते।
जय हो
एक घटना मेरे साथ भी घटी आप सुनेंगे तो हंसेंगे
एक दुकान में मैं किराने का सामान खरीद रहा था। उसी समय एक बच्चा आया। उसने दुकानदार से कहा अंकल वन केजी चीनी व चाय की पत्ती देना । दुकान वाले ने उसे एक किलो चीन व एक टाटा प्रीमियम ब्रांड वाली चाय की पत्ती उसे दे दी। बच्चे ने दुकान वाले से पूछा कितना हुआ । दुकान वाले ने कहा अड़तालीस रुपये हुए । बच्चे की समझ में अड़तालीस रुपये नहीं आये । बच्चे ने कहा अंकल अड़तालीस रुपये नहीं समझ पाया अंग्रेजी में बोलो । दुकान वाला पढ़ा लिखा था उसने बच्चे से मजाक में कहा ऐटी एट (88) रुपये हुए । बच्चे ने झट से 100 के नोट निकाल के दे दिए। मेरे नजर उस बच्चे पर गई । हमने कहा कि किस स्कूल में पढ़ते हो । उसने कहा जसीडीह संत फ्रांसिस स्कूल में । तभी दुकान दार ने कहा तुम हिन्दी में रुपये की भाषा नहीं समझोगे तो कोई भी तुमको ठग लेगा। बच्चा मुंह ताकता रह गया। हमने दुकान वाले से कहा तुम्हारा बच्चा कितना बड़ा है । उसने कहा 5 साल का। तुम्हारा बच्चा जब बड़ा होगा तो किस स्कूल में पढ़ाओगे । तो उसने कहा अभी यही स्कूल सबसे अच्छा है । तभी हमने कहा तुमने अभी तुरंत उस बच्चे को कहा था कि हिन्दी में रुपये की भाषा नहीं समझोगे तो कोई भी तुम्हें ठग लेगा। कल तुम्हारे बच्चे भी इसी भाषा को समझेंगे।
।।।।।।। हमारे कहने का मतलब यह नहीं है कि आप अच्छे स्कूल में बच्चे का नामांकन न कराएं ।।।।।। लेकिन बच्चों का नामांकन कराने के समय यह जरूर देखें कि विद्यालय में बच्चों को हिन्दी की शिक्षा दी जाती है कि नहीं । क्योंकि बच्चे देश के भविष्य होते हैं। हमेशा से हमने ऐसा कहा है । तो देश के भविष्य के खिलवाड़ के साथ देश की गरिमा को मिटाने का काम न करें।
क्योंकि हिन्दी हमारी अपनी भाषा है और कोई अपनों के साथ दगाबाजी करे यह क्या आपसे बर्दाश्त होगा। कतई नहीं। हिन्दी को आत्मसात करने की शिक्षा अपने बच्चों को जरूर दें। यह तभी संभव है जब हर अभिभावकों के मन में ऐसी बातें पैदा होगी। अभिभावकों को जागरूक होना होगा। यह तभी संभव है।
क्योंकि यदि पेड़ का जड़ मजबूत होगा तभी पेड़ फलेगा फुलेगा। जब जड़ ही मजबूत नहीं होगा तो अच्छे तना व अच्छे फल की कामना हम कतई नहीं कर सकते।
जय हो
9/08/2009
एक सपना जो साकार नहीं हो सका
वर्ष 1947 में जब भारत आजाद हुआ था तो स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने वाले स्वतंत्रता सेनानियों ने ना जाने क्या क्या सपने देखे होंगे। उन्होंने सोचा होगा कि आजादी हासिल होने के बाद हम खुले वतन में सांस ले सकेंगे। सारी सुविधा हमें मिल पायेगी। लेकिन आज उसका ठीक उल्टा हो रहा है। स्वतंत्रता सेनानियों को अपना हक हासिल करने हेतु लड़ाई लड़नी पड़ रही है। पिछले दिनों हमारे शहर में स्वतंत्रता सेनानियों व उनके आश्रितों की एक बैठक आयोजित की गई। बैठक में उन्होंने कहा कि हम किसी भी समस्या का आवेदन लेकर प्रशासन के पास जाते हैं तो प्रशासन द्वारा हमारे आवेदनों को तरजीह नहीं दिया जाता है। ऐसा क्यों ------
जिन स्वतंत्रता सेनानियों के बदौलत देश आजाद हुआ। जो अपनी जान की फिकर किए बिना आजादी की लड़ाई में कूद गए थे। उनके साथ ऐसा सौतेलापन व्यवहार क्यों। आखिर सरकार और प्रशासन को कौन समझाए। सभी सत्ता के भूखे हैं। आज हर कोई नेता मुख्यमंत्री बनना चाह रहा है। हर प्रशासन के नुमाईंदे चाहते हैं कि हमारी भी एक बड़ी सी कोठी हो::::::हमारी भी दो तीन अच्छी अच्छी कारें हों::::: इन्हीं सोच और इन्हीं सोच को साकार करने में इनके समय कट जाते हैं। भला दूसरों की समस्या से इन्हें क्या लेना देना::::
नेताओं की बात तो मत ही कहिए तो बेहतर होगा:::: आज जो आपके वोट के बदौलत सत्ता पर काबिज हुए हैं ::::: वो कल पहचानेंगे तक नहीं :::: लेकिन एक बात है वोट लेने के समय वो आपके पास मिन्नतें मांगने जरूर जायेंगे::::
अब आप ही बतायें जिन्हें देश भक्ति से कोई लेना देना नहीं वो सत्ता पर बैठ कर क्या देश की सेवा कर पायेंगे::::
वो स्वतंत्रता सेनानियों को क्या सुविधा मुहैया करा पायेंगे::::::
वो जवान शहीदों को क्या दे सकते हैं:::::::::
जिन स्वतंत्रता सेनानियों के बदौलत देश आजाद हुआ। जो अपनी जान की फिकर किए बिना आजादी की लड़ाई में कूद गए थे। उनके साथ ऐसा सौतेलापन व्यवहार क्यों। आखिर सरकार और प्रशासन को कौन समझाए। सभी सत्ता के भूखे हैं। आज हर कोई नेता मुख्यमंत्री बनना चाह रहा है। हर प्रशासन के नुमाईंदे चाहते हैं कि हमारी भी एक बड़ी सी कोठी हो::::::हमारी भी दो तीन अच्छी अच्छी कारें हों::::: इन्हीं सोच और इन्हीं सोच को साकार करने में इनके समय कट जाते हैं। भला दूसरों की समस्या से इन्हें क्या लेना देना::::
नेताओं की बात तो मत ही कहिए तो बेहतर होगा:::: आज जो आपके वोट के बदौलत सत्ता पर काबिज हुए हैं ::::: वो कल पहचानेंगे तक नहीं :::: लेकिन एक बात है वोट लेने के समय वो आपके पास मिन्नतें मांगने जरूर जायेंगे::::
अब आप ही बतायें जिन्हें देश भक्ति से कोई लेना देना नहीं वो सत्ता पर बैठ कर क्या देश की सेवा कर पायेंगे::::
वो स्वतंत्रता सेनानियों को क्या सुविधा मुहैया करा पायेंगे::::::
वो जवान शहीदों को क्या दे सकते हैं:::::::::
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