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2/17/2010

जरूरत

संगीता का पति झालु ठेला चलाने का काम करता है। दिन भर जद्दोजहद के बाद किसी तरह 60 से 70  रुपया कमा लेता है। झालु शराब का आदी है। अपनी कमाई का आधा हिस्‍सा वह शराब पीने में गंवा देता है। बांकी के बचे पैसे वह संगीता को देता है। संगीता उन पैसों में 8 से 10 रुपया रोज बचाती है। ताकि महीने का मकान भाड़ा दिया जा सके। बांकी के पैसे से घर का खाना चलता है। यहां अंदाजा लगाया जा सकता है कि रोज 20 से 25 रुपया का खाना घर में आता है। कमरतोड़ महंगाई में उसके घर में क्‍या बनता होगा यह कहने की बात नहीं है। किसी तरह अपने और अपने बच्‍चों का पेट भर लेती है। संगीता को अपने पेट से ज्‍यादा जवान हो रही बेटी की चिंता है। इतनी कमाई में पेट तो किसी तरह भर जाता है। लेकिन बेटी की शादी कैसे होगी।
वह अपना दुख किसे सुनाये । दुर्भाय से वह गूंगी है। शायद झालू भी घर की परेशानी व दिन भर की मेहनत के कारण थक हार कर शराब को अपना साथी बना लिया है।
ऐसी बात नहीं है कि झालु इस बात को नहीं समझता है। वह भी इस बात को समझता है और बोलते बोलते फफक कर रो पड़ता है। झालु आखिर करें तो क्‍या करें। घर की माली हालत ठीक नहीं होने के कारण वह पढ़ भी नहीं पाया। किसी तरह दो अक्षर अपना नाम लिख लेता है।
सूर्य निकलते ही झालू ठेला लेकर निकल पड़ता है। गूंगी संगीता भी अपने बच्‍चों को छोड़कर दूसरे के घर बर्तन बासन धोने चली जाती है। दूसरों के घर से लाये भोजन और झालू की कमाई से बने भोजन को वह अपने बच्‍चों के बीच बांट देती है। जो बचता है अपना और झालू का पेट भर लेती है।
उसका भाडे़ का घर भी टूटे फूटे खपरैल का है।
झालू ने कहा कि कई नेताओं से अपने उद्धार की बात कही। लेकिन कोई नहीं उनकी बात सुनता थक हार कर अपनी बदहाली का जीवन को अपना साथी बना लिया है। बेटी की शादी की बात पर वह कहता है कि अब ईश्‍वर ही उसकी बेटी की शादी करायेगा।
यहां गौर करने वाली बात यह है कि हमारे नेता अपने आप को जनता का सेवक कहते हैं। लेकिन सेवा करने में पीछे हो जाते हैं। गरीबों के पैसे को अपने झोली में डाल लेते हैं। यहां तक कि प्रशासन ने भी कभी ध्‍यान नहीं दिया। न तो उसे इंदिरा आवास मिला, ना लाल कार्ड, मिली उसे क्‍या तो सिर्फ दुख भरी जिंदगी।
ऐसे कितने झालू मिलेंगे हमारे समाज में। कौन इनकी खैरियत सोचेगा। कौन इनके उद्धार को आगे आयेगा। यह एक यक्ष प्रश्‍न है।
ऐसे लोगों का उद्धार हो सकता है। बशर्ते की हमारे नेता अपनी मानसिकता बदल लें। प्रशासन अपने कर्तव्‍यों पर खरा उतरे। समाज के अमीर लोग अपने साथ साथ इनके बारे में भी सोचें।
तो शायद इनका उद्धार हो सकता है। लेकिन यह तभी संभव है जब हम संकल्‍प लेंगे। इसके लिए हमें ही आगे आना होगा। हमें ही अपने मन में संकल्‍प की भावना जगानी होगी।

2/16/2010

सहायता

निरंजन पढ़ा लिखा इंसान है। वह नौकरी करना चाहता है। अपनी कमाई से अपने मां बाप की सेवा करना चाहता है। लेकिन चाह कर भी वह असमर्थ है। क्‍योंकि उसकी सांसें चल रही है तो सिर्फ ईश्‍वर की कृपा से। निरंजन की दोनों किडनी खराब हो चुकी है। परिवार के पास उतने अर्थ नहीं हैं जिससे निरंजन का इलाज करवा सके। उसके इलाज में करीब 8 लाख रुपये का खर्च आयेगा। दो दिन यहां के अखबारों में खबर छपी :::: निरंजन जीना चाहता है:::: लोग उसकी मदद को खड़े हुए। यहां के समाज सेवी उसकी मदद को आगे आये।
16 फरवरी दिन के 3 बजे थे। टावर चौक पर कुछ प्रबुद्ध लोग लोगों के जूता पालिस कर रहे थे। पूछने पर पता चला कि सभी निरंजन के इलाज के लिए चंदा इकट्ठा कर रहे हैं। समाज सेवा की यह भावना देख किसी का भी मन पसीज सकता है। कईयों ने इसके लिए हजारों रुपये दिये। लेकिन यहां तो लाखों की जरूरत है। चलिए जो भी हो सेवा की भावना तो जगी। अब आगे की रणनीति है भीक्षाटन। अब शायद निरंजन का इलाज हो पाये। यहां इलाज की जल्‍दीबाजी भी है। निरंजन के पिता नहीं हैं। उसका बड़ा भाई पारा शिक्षक है। अब आप ही सोच सकते हैं कि घर की माली हालत क्‍या होगी।
:::::::: समाज में निरंजन जैसे कई लोग हैं जो अर्थ के अभाव में इलाज नहीं करवा पा रहे हैं और काल के गाल में समाते जा रहे हैं। सेवा की भावना मन में जगानी होगी।
समाज में कई लोग ऐसे हैं जो गरीबों व लाचारों की मदद में काम आ सकते हैं। मन में सेवा का संकल्‍प लेना होगा। मानव मानव के बारे में नहीं सोचेगा तो कौन सोचेगा।

2/15/2010

संकल्‍प: क्‍या होगा हमारी संस्‍कृति का

संकल्‍प: क्‍या होगा हमारी संस्‍कृति का

क्‍या होगा हमारी संस्‍कृति का

वेलेनटाईन डे
आखिर क्‍या है वेलेनटाईन डे। हमने एक व्‍यक्ति से यह प्रश्‍न किया। उसने जवाब दिया। अपने प्रेयशी को गिफ्ट देने का दिन है वेलेनटाईन डे। हमने फिर एक प्रश्‍न दागा। ऐसी क्‍या बात है कि लोग आज ही के दिन अपने प्रेयशी को गिफ्ट देते हैं। वह व्‍यक्ति चुप हो गया। उसके पास कोई जवाब नहीं थे। तब हमने कहा। आप नहीं जानते हैं मैं बताता हूं आपको क्‍या है वेलेनटाईन डे।
हमने कहा जानते हैं जिस अंग्रेजों को भगाने के लिए हमारे देश के क्रांतिकारियों ने अपने प्राण गंवा दिये उसी अंग्रेज के जन्‍म दिन को वेलेनटाईन डे के रूप में मनाते हैं। वह व्‍यक्ति बोला ऐसी बात है तो हम कभी नहीं वेलेनटाईन डे मनायेंगे।
यही बात है जो लोग वेलेनटाईन डे मनाते हैं। शायद वह भारतीय कहलाने लायक नहीं हैं। हम क्‍यों अंग्रेज के जन्‍म दिन को मनायें।
मेरा शहर है तो बहुत छोटा  लेकिन है बड़ा रमणीक स्‍थल। मेरे शहर के आसपास प्रकृति का सौंदर्य बिखेरने वाले दर्जनों पहाड़ पर्वत हैं। मैं वेलेनटाईन डे के दिन घूमने निकला। मेरे शहर से 2 किमी की दूरी पर एक छोटा सा पहाड़ है नंदन पहाड़। वहां हमने देखा कई जोड़े छुप छुप कर बैठे हुए थे। आखिर क्‍यों भाई। वेलेनटाईन डे स्‍पेशल क्‍यों। कई दिन हमारे समाज में हैं। पत्नियां अपने पति की सलामती के लिए कई कठिन से कठिन व्रत रखती हैं। वो रखो। वेलेनटाईन डे क्‍यों।
आखिर इन्‍हें समझाये कौन। ऐसा करने वाले के मां बाप भी तो इसी संस्‍कृति में चलने की चेष्‍टा करते हैं। पता नहीं हमारी संस्‍कृति का क्‍या होगा।
 लोगों को इसके बारे में सोचना होगा।
इसके लिए लोगों को आगे आना होगा।
यह तभी संभव है जब हम और आप जागृत होंगे। बिना जागृति के कोई कार्य संपन्‍न नहीं हो सकता। वह अधूरा ही रह जायेगा। अंग्रेजी संस्‍कृति को छोड़ना होगा। इसके लिए हमें संकल्‍प लेना होगा।
जय भारत
जय हिन्‍दुस्‍तान
जय हिन्‍दी
जय हो।।।।।

12/19/2009

संकल्‍प: पनाह

संकल्‍प: पनाह

संकल्‍प: पनाह

संकल्‍प: पनाह

पनाह

शायद आपने एक शायरी सुनी होगी //// हमें तो अपनों ने लूटा गैरों में कहां दम था मेरी कस्‍ती थी डूबी वहां जहां पानी कम था///// शायद अंधी सुनीता के साथ भी ऐसा ही हुआ। उसे उसके मां बाप और बाद में ससुराल ने शराब की खाली बोतल की तरह खाली समझ कर घर से बाहर निकाल दिया। उस समय तो मानो सुनिता के सिर पर एक ही ठिकरा फोडा गया कि अब तुम बेकार हो चुकी हो। लेकिन आपने एक ऐसा भी गीत सुना होगा ////// जिसका कोई नहीं उसका तो खुदा होता है///// और सुनीता के साथ भी ऐसा ही हुआ। उसे हमारे शहर के एक आश्रम में पनाह मिली और वहां वह सामान्‍य जीवन जी रही है।
सुनीता जन्‍म से अंधी थी। यह अभिशाप तो उसे मिला ही था। उसके माता पिता ने उसे गांव के ही एक विकलांग से शादी करवा दिया (दूसरा अभिशाप) । इतना ही नहीं शादी के कुछ दिन बाद ही उसका विकलांग पति इस दुनियां को छोड कर चल पडा और वह विधवा हो गई (तीसरा अभिशाप )। तब तक ईश्‍वर ने अभिशाप का साथी बना दिया उसे। इसके बाद क्‍या था। पति मरने के बाद ससुराल वालों ने घर से निकाल दिया और कहा कि तुम अब किसी काम की नहीं हो। वह घर गई मां बाप ने भी उसे घर चढने नहीं दिया और बाहर से ही भगा दिया और कहा यहां क्‍यों आई हो तुम अपने ससुराल जाओ। उसने जब अपना दुखडा सुनाया तो माता पिता ने भी उसे बेकार की संज्ञा देकर उसे धर से निकाल दिया। वह भटकती फिरती रही। कहीं उसे किसी ने पनाह नहीं दी। लेकिन शायद भगवान ने इस बार उसकी सुन ली और वह नारायण आश्रम पहुंच गई। आज सुनीता अपनी जीवन जी रही है। सुनीता गर्भ से है। नारायण आश्रम के संरक्षक हरेराम पांडेय ने कहा कि गर्भ की स्थिति में इसका विशेष ख्‍याल रखा जाना चाहिए। और वह और उनकी पत्‍नी सुनीता का ख्‍याल रख भी रहे हैं। सुनीता खुश है।
/////////हमने पहले ही कहा था- ऐसी सुनीता का जन्‍म हमारे जैसे समाज में ही होता है। लेकिन उसे पनाह भी हमारे समाज के ही लोगों को देना होता है। हमें संकल्‍प लेना होगा बेटा-बेटी एक समान।