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8/28/2010

हर मोड़ पर मंडराती मौत

यूं कहें तो हर मोड़ पर मौत मंडराती है। जरा सी चूक व असावधानी के कारण आप मौत को गले लगा सकते हैं। आये दिन हर गली, हर मार्ग पर मौत मुंह बाये खड़ी रहती है। यदि आप जरा सा भी चूके तो पलक झपकते ही आप गए। समाचार पत्रों व टीवी चैनलों पर रोज दर्जनों दुर्घटनाओं के समाचार सुनने को मिलेंगे। खास कर छोटे शहरों में जहां यातायात के नियम सिर्फ दिखावे के लिए होते हैं। सच कहें तो आज कल 50 फीसदी लोगों को अच्‍छी तरह वाहन चलाने आता ही नहीं। वे तो रिश्‍वत देकर वाहन चलाने का लाईसेंस विभाग से बनवा लेते हैं। मुश्किल से आपको 2 से ढ़ाई हजार खर्च होंगे आपको वाहन चलाने आता हो या नहीं लाईसेंस आपको मिल जायेगा। चलिए यह भी मान लेते हैं कि आप वाहन चलाने भली भांति जानते हैं, यातायात के नियम भी आपको पता है लेकिन जब आप वाहन चला रहे होते हैं तो बगल वाले वाहन चालक की क्‍या गारंटी है कि वो वाहन चलाने जानता हो उसे नियम पता हो। वो आपके लिए खतरा बन सकता है। साल भर में देवघर जिले में वाहन दुर्घटना में 1 दर्जन से ज्‍यादा लोगों की मौत होती है। चाहे कारण जो भी हो, यातायात नियम के नाम पर सिर्फ थोथी दलीलें पढ़ी जाती हैं। आज हर शहर में युवा वर्गों में तेज गति से मोटरसाईकिल चलाने का क्रेज है। यह उनके लिए प्रेस्‍टीज बन गया है। इन्‍हें संभालने की जरूरत है।

8/27/2010

लेह का जलजला

लेह के जलजले ने सैकड़ों परिवार का चूल्‍हा ठंडा कर दिया। कई अनाथ हुए, कई महिलाएं असमय विधवा हो गयी, कई मां की गोदें सूनी हो गयी। सरकार ढि़ढोरा पीट कर कहती है मनरेगा के कारण मजदूर रोजी रोटी के लिए बाहर नहीं जा रहे। यदि उन मजदूरों को अपने गृहक्षेत्र में ही दाना पानी मिलता तो वे लेह क्‍यों जाते।
मेरा जिला छोटा है, यहां का जिला प्रशासन भी मनरेगा में अच्‍छे प्रदर्शन के लिए प्रधानमंत्री से सम्‍मान पुरस्‍कार ले कर आया है। यह सम्‍मान पुरस्‍कार शायद झूठा है। यदि मनरेगा की स्थिति अच्‍छी होती तो यहां के मजदूर लेह क्‍यों जाते। लेह के जलजले के कुछ दिनों के बाद से ही धीरे धीरे यह बात छन कर आ रही है कि यहां के मजदूर लेह में फंसे हुए हैं। उनका ना तो कोई अता पता चल रहा है ना ही वे ही कोई अता पता अपने परिवार का लगा रहे हैं। इसके बारे में अभी तक प्रशासन नहीं सोच रही है। उनका पता लगाना किसकी जिम्‍मेवारी है। यदि वो जिंदा हैं तो उन्‍हें घर लाने का काम कौन करेगा। यह जिला प्रशासन का काम है।
कोरे उपलब्धियों का बखान करने में सरकार व प्रशासन को जरा भी झिझक महसूस नहीं होती। शायद उनकी यह पुरानी बीमारी है। तो फिर विकास की बात तो बेमानी ही होगी। झारखंड तो भ्रष्‍टाचार का महासागर है। यहां के हर महकमों में भ्रष्‍टाचार चिपका है।
यह बात समझ में नहीं आती जो जनप्रतिनिधि जनता के बीच से चुने जाते हैं वो क्‍या कर रहे हैं। उन्‍हें क्‍या जब चुनाव आये बस जीत जायें यही उनका उद्देश्‍य होता है इसके बाद जनता को दाना पानी मिले या ना मिले इससे उन्‍हें क्‍या मतलब।
भोली जनता भी उनके लुभावने वादों में फंस जाते हैं। जिसका परिणाम यह होता है सब कुछ रहने पर भी अभाव की जिंदगी उनका साथी बन जाता है।

8/06/2010

लावारिश लाशों को दो गज कफन भी मयस्‍सर नहीं

हर मनुष्‍य की यह ख्‍वाहिश होती है कि जब तक वो जिंदा है तब तक वह सुखी पूर्वक जी सके और जब वह मृत्‍यु प्राप्‍त कर ले तो उसकी अंतिम विदाई चार कांधो से हो । उसका अंतिम संस्‍कार भी धार्मिक रीति रिवाज के साथ हो। चाहे वह हिन्‍दु हो या मुसलमान, सिक्‍ख या ईसाई। सभी धर्मों में अंतिम संस्‍कार का रिवाज है। महापुरुषों ने शायद सही कहा है कलियुग में मनुष्‍य अपना ईमान खोता जा रहा है। सही भी है उसका साक्ष्‍य यह तस्‍वीर है। मनुष्‍य इतना संवेदन हीन हो गया है कि वह मनुष्‍य को उसका हक नहीं दिला पा रहा। कल तक यही मनुष्‍य जो सबके साथ घूमता फिरता था आज उसकी यह स्थिति, बहुत शर्मींदगी की बात है। तस्‍वीर दिल दहला देने वाली है। मनुष्‍य के मरने के बाद यह स्थिति शायद इसके बारे में किसी ने सोचा भी नहीं होगा। यहां ना तो उसे दो गज कफन मिला ना ही दो गज जमीन। वह भी धार्मिक नगरी देवघर में। अखबार वालों ने भी इसे प्रमुखता से छापा। उनकी भी मंशा रही कि शायद खबर से किसी की आंख खुल जाय। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। देवघर शहर जहां द्वादश ज्‍योतिर्लिंगों में एक बाबा बैद्यनाथ विराजमान हैं। उस शहर में प्रशासन इतना संवेदनहीन हो गया है कि लावारिश मरने वालों को वह दो गज कफन मयस्‍सर नहीं करा पा रहा। जबकि प्रशासन को लावारिश लाशों के अंतिम संस्‍कार के लिए पैसे भी हैं। फिर भी इतनी शर्मनाक संवेदनहीनता। इस तस्‍वीर को जरा गौर से देखिए, ये एक लावारिश लाश है जिसे कुत्‍ते नोच नोच कर खा रहे हैं। बगल में एक और लाश पड़ी है सफेद रंग के बोरे में बंद, साथ ही यहां से ठीक 40 गज की दूरी पर एक और लाश पड़ी थी। आखिर क्‍या कसूर था इनका, जो मरने के बाद इन्‍हें कुत्‍तों चीलों के हवाले कर दिया गया। कसूरवार भी हो तो जब तक वह जिंदा है तब तक उसे सजा दी जा सकती है। लेकिन मरने के बाद ऐसी सजा देना यह किस कानून के पन्‍ने में लिखा है। इसका जवाब कौन देगा।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
ऐसी परिस्थिति दुबारा ना हो इसका क्‍या उपाय है। इसका एक ही उपाय है, एकता पूर्वक खड़ा होने का। हम जागरूक होंगे तो जग जागरूक होगा।

7/26/2010

हर हर महादेव

26 जुलाई को विश्‍व प्रसिद्ध श्रावणी मेला शुरू हो गया है। पूरे महीने कांवरियों का जनसैलाब देवघर में उमड़ेगा। उत्‍तरवाहिनी गंगा सुल्‍तानगंज से पांव पैदल चल कर प्रतिदिन हजारों की संख्‍या में कांवरिये बाबाधाम पहुंचेंगे। शिवभक्‍तों को किसी तरह की परेशानी ना हो इसके लिए प्रशासन, स्‍वयं सेवी संस्‍था व आम जन मुस्‍तैद रहेंगे। सभी उनकी सेवा कर पुण्‍य बटोरने की जद्दोजहद में लगे रहेंगे। सुल्‍तानगंज से लेकर देवघर तक शिवभक्‍तों के सेवार्थ हजारों शिविर लगे रहते हैं। लगभग शिविरों में कांवरियों की नि:शुल्‍क सेवा की जाती है। उनके ठहराव, भोजन, चिकित्‍सा सेवा, नींबू पानी, गरम पानी, शर्बत की समुचित व्‍यवस्‍था की जाती है। प्रशासन की ओर से भी भरपूर सेवा की जाती है। पूरे महीने आम जन भी कांवरियों की सेवा में व्‍यस्‍त रहते हैं।
एक बता दूं कि यहां एक कहावत चरितार्थ है। एक महीने कमाओ साल भर खाओ।
दूर दूर से लोग पूरे महीने यहां कमाने आते हैं। छोटे छोटे दुकानों की भरमार रहती है। कोई शहर का कोई हिस्‍सा खाली नहीं रहता। पूरे महीने अरबों का व्‍यवसाय होता है। सबसे ज्‍यादा प्रसाद के रूप में बिकने वाले पेड़ा व इलाईची दाना का। रोज करोड़ों का व्‍यवसाय होता है। और हो भी क्‍यों नहीं लाखों की भीड़ जो जुटती है। श्रावण महीना में इस तरह का नजारा कहीं देखने को नहीं मिलता।
बाबा बैद्यनाथ की पूजा के लिए पूरे महीने रोजाना लंबी कतार लगी रहती है। विशेषत: सोमवार व मंगलवार के दिन। कहते हैं पहले इस तरह की भीड़ नहीं जुटती थी। धीरे धीरे बदलाव आया और मेला का फलक भी बढ़ा। मीडिया कर्मी भी पूरे महीने सावन की खबरों के संकलन में कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहते। वे भी अपना फलक बढ़ाने में लगे रहते हैं।
सुल्‍तानगंज से देवघर तक पांव पैदल आने वाले कांवरियों की कतार पूरे महीने लगी रहती है। कतार ऐसा कि कोई एक डब्‍बा यदि कांवरियों के हाथ दे दिया जाय तो एक दूसरे को बढ़ाते बढ़ाते वह डब्‍बा देवघर आ जायेगा।
रावणेश्‍वर बैद्यनाथ की महिमा ही निराली है। सभी बाबा भोले की मस्‍ती में मस्‍त रहते हैं सभी बोल बम की रट लगाए रहते हैं। उनके मुख से बोल बम का शब्‍द निकला कामन हो जाता है। एक दूसरे को बम कहकर ही पुकारते हैं।

3/31/2010

हर एक फूटपाथ हमारा घर है

उसकी आंखें कुछ कहती थी



मैं सुन रहा था उसके दर्द को


उसकी चुभन को


मेरे जेहन में उसकी हर एक हरकत


घर करती जा रही थी


हमने कहा क्यों बाबू


तुम्हारा घर कहां है


उसने कहा हर एक फूटपाथ हमारा घर है


क्या करते हो


उसने दर्द भरी आवाज में कहा


चाय की दुकान में नौकरी


कितने मिलते हैं


200 रुपया प्रतिमाह


उसकी बातें सुन मेरी दिल से आह निकल गई।


आखिर ऐसा क्यों


होता है इन बच्चों के साथ


कोई न कोई तो होगा देने वाला इनका साथ।


इनके हाथ में हाथ हमें ही देना होगा


इन्हें रास्ते पर लाने का संकल्प?


हमें ही लेना होगा।

3/07/2010

महिला दिवस

महिला दिवस : लोग समारोह आयोजित कर महिलाओं को जागृत करने का संकल्‍प तो लेते हैं लेकिन संकल्‍प सिर्फ समारोह तक ही सीमित रहता है। यह संकल्‍प समारोह स्‍थल से बाहर नहीं निकल पाता है। पहले हमारे द्वारा लिए गए संकल्‍प को और सशक्‍त बनाना होगा। तभी महिला सशक्तिकरण को सही अर्थ मिल सकता है। महिलाओं को सही दिशा मिल सकती है।
इन्‍हें देखिए:::: ये बच्‍ची फूटपाथ पर पापकार्न बनाने का काम कर रही है। लोग पांच रुपया दस रुपया देकर इसे खरीद कर ले जायेंगे। लेकिन उन्‍हें सशक्तिकरण से जोड़ने का कोई प्रयास नहीं करेंगे। ये बच्‍ची दिन भर में मुश्किल से पचास रुपया कमा पाती है। ऐसे में 10 सदस्‍यों वाला परिवार कैसे चल पायेगा। यह इसके लिए यक्ष प्रश्‍न है।

क्‍या कसूर था लक्ष्‍मण का

भुखमरी, यह शब्‍द सुन कर ही जेहन के लाखों करोड़ों रोंगटे खडे़ हो जाते हैं। आखिर लक्ष्‍मण ने ऐसी कौन सी खता की थी कि भुखमरी के कारण उसने काल को गले लगा लिया। लक्ष्‍मण मजदूर था, वह मजदूरी कर अपना और अपने परिवार का पेट पालता था। लेकिन महीनों तक काम नहीं मिलने के कारण वह बेकार घर में बैठा रहा। वह दूसरा और कोई काम भी नहीं कर सकता था जिससे उसे अर्थ की कमाई हो सके। बेकारी ने उसे भुखमरी के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया। अंतत: जीवन की लड़ाई में वह हार गया और काल के गाल में समा गया।
देवघर जिले के मोहनपुर प्रखंड की यह घटना है। लक्ष्‍मण नि:संतान था। रोज की कमाई उसके पेट भरने में मददगार थी लेकिन जब वह बेकार बैठ गया तो उसे खाने के लाले पड़ने लगे। कोई उसके मदद को नहीं आया। यहां कि गांव वाले भी नहीं। आखिर गांव वाले आते भी कैसे पूरे गांव में भीषण गरीबी है। वे अपना पेट पाले की लक्ष्‍मण का। इस उधेड़बुन में लोगों ने लक्ष्‍मण पर ध्‍यान नहीं दिया। आश्‍चर्य करें जिस लक्ष्‍मण के वोट से जन प्रतिनिधि चुने गए वह जन प्रतिनिधि भी उनके मदद को नहीं पहुंच पाये। प्रशासन की तो बात ही मत पूछिए उसे कोई बताये तो जान पाये नहीं बताये तो पूरी तरह अनजान रह जाये। प्रशासन व जन प्रतिनिधि की तंद्रा तब टूटी जब लक्ष्‍मण स्‍वर्ग सिधार चुका था। उसके देहावसान के बाद सभी उनकी मदद को आये;;;; इसे दुर्भाग्‍य नहीं कहेंगे तो और क्‍या। लेकिन अब पछतायत होत क्‍या जब चिडि़यां चुग गई खेत
ऐसे कई लक्ष्‍मण हैं जो भुख के कारण मौत को गले लगा रहे हैं। सरकार ने गरीबों के लिए कई योजनाएं चला रखे हैं। लेकिन यह योजनाएं सिर्फ लफ्फाजी साबित होती हैं। इन योजनाओं को जायज मुकाम तक पहुंचाने का बीड़ा उठाये प्रशासन के मुलाजिम ही योजनाओं को गटक जाते हैं।

आखिर जिनके लिए योजनाएं चलाई जा रही है उन तक क्‍यों नहीं पहुंच रही है यह एक बहुत बड़ा प्रश्‍न है। इसके लिए जिम्‍मेवार कौन है।