उसकी आंखें कुछ कहती थी
मैं सुन रहा था उसके दर्द को
उसकी चुभन को
मेरे जेहन में उसकी हर एक हरकत
घर करती जा रही थी
हमने कहा क्यों बाबू
तुम्हारा घर कहां है
उसने कहा हर एक फूटपाथ हमारा घर है
क्या करते हो
उसने दर्द भरी आवाज में कहा
चाय की दुकान में नौकरी
कितने मिलते हैं
200 रुपया प्रतिमाह
उसकी बातें सुन मेरी दिल से आह निकल गई।
आखिर ऐसा क्यों
होता है इन बच्चों के साथ
कोई न कोई तो होगा देने वाला इनका साथ।
इनके हाथ में हाथ हमें ही देना होगा
इन्हें रास्ते पर लाने का संकल्प?
हमें ही लेना होगा।
प्रिय बंधुओं संकल्प मनुष्य के जीवन में एक नया बदलाव ला सकता है। जब तक हम संकल्पित नहीं होंगे तब तक हम अपने जायज मुकाम तक नहीं पहुंच सकते।
3/31/2010
3/07/2010
महिला दिवस
महिला दिवस : लोग समारोह आयोजित कर महिलाओं को जागृत करने का संकल्प तो लेते हैं लेकिन संकल्प सिर्फ समारोह तक ही सीमित रहता है। यह संकल्प समारोह स्थल से बाहर नहीं निकल पाता है। पहले हमारे द्वारा लिए गए संकल्प को और सशक्त बनाना होगा। तभी महिला सशक्तिकरण को सही अर्थ मिल सकता है। महिलाओं को सही दिशा मिल सकती है।
इन्हें देखिए:::: ये बच्ची फूटपाथ पर पापकार्न बनाने का काम कर रही है। लोग पांच रुपया दस रुपया देकर इसे खरीद कर ले जायेंगे। लेकिन उन्हें सशक्तिकरण से जोड़ने का कोई प्रयास नहीं करेंगे। ये बच्ची दिन भर में मुश्किल से पचास रुपया कमा पाती है। ऐसे में 10 सदस्यों वाला परिवार कैसे चल पायेगा। यह इसके लिए यक्ष प्रश्न है।
क्या कसूर था लक्ष्मण का
भुखमरी, यह शब्द सुन कर ही जेहन के लाखों करोड़ों रोंगटे खडे़ हो जाते हैं। आखिर लक्ष्मण ने ऐसी कौन सी खता की थी कि भुखमरी के कारण उसने काल को गले लगा लिया। लक्ष्मण मजदूर था, वह मजदूरी कर अपना और अपने परिवार का पेट पालता था। लेकिन महीनों तक काम नहीं मिलने के कारण वह बेकार घर में बैठा रहा। वह दूसरा और कोई काम भी नहीं कर सकता था जिससे उसे अर्थ की कमाई हो सके। बेकारी ने उसे भुखमरी के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया। अंतत: जीवन की लड़ाई में वह हार गया और काल के गाल में समा गया।
देवघर जिले के मोहनपुर प्रखंड की यह घटना है। लक्ष्मण नि:संतान था। रोज की कमाई उसके पेट भरने में मददगार थी लेकिन जब वह बेकार बैठ गया तो उसे खाने के लाले पड़ने लगे। कोई उसके मदद को नहीं आया। यहां कि गांव वाले भी नहीं। आखिर गांव वाले आते भी कैसे पूरे गांव में भीषण गरीबी है। वे अपना पेट पाले की लक्ष्मण का। इस उधेड़बुन में लोगों ने लक्ष्मण पर ध्यान नहीं दिया। आश्चर्य करें जिस लक्ष्मण के वोट से जन प्रतिनिधि चुने गए वह जन प्रतिनिधि भी उनके मदद को नहीं पहुंच पाये। प्रशासन की तो बात ही मत पूछिए उसे कोई बताये तो जान पाये नहीं बताये तो पूरी तरह अनजान रह जाये। प्रशासन व जन प्रतिनिधि की तंद्रा तब टूटी जब लक्ष्मण स्वर्ग सिधार चुका था। उसके देहावसान के बाद सभी उनकी मदद को आये;;;; इसे दुर्भाग्य नहीं कहेंगे तो और क्या। लेकिन अब पछतायत होत क्या जब चिडि़यां चुग गई खेत ।
ऐसे कई लक्ष्मण हैं जो भुख के कारण मौत को गले लगा रहे हैं। सरकार ने गरीबों के लिए कई योजनाएं चला रखे हैं। लेकिन यह योजनाएं सिर्फ लफ्फाजी साबित होती हैं। इन योजनाओं को जायज मुकाम तक पहुंचाने का बीड़ा उठाये प्रशासन के मुलाजिम ही योजनाओं को गटक जाते हैं।
आखिर जिनके लिए योजनाएं चलाई जा रही है उन तक क्यों नहीं पहुंच रही है यह एक बहुत बड़ा प्रश्न है। इसके लिए जिम्मेवार कौन है।
देवघर जिले के मोहनपुर प्रखंड की यह घटना है। लक्ष्मण नि:संतान था। रोज की कमाई उसके पेट भरने में मददगार थी लेकिन जब वह बेकार बैठ गया तो उसे खाने के लाले पड़ने लगे। कोई उसके मदद को नहीं आया। यहां कि गांव वाले भी नहीं। आखिर गांव वाले आते भी कैसे पूरे गांव में भीषण गरीबी है। वे अपना पेट पाले की लक्ष्मण का। इस उधेड़बुन में लोगों ने लक्ष्मण पर ध्यान नहीं दिया। आश्चर्य करें जिस लक्ष्मण के वोट से जन प्रतिनिधि चुने गए वह जन प्रतिनिधि भी उनके मदद को नहीं पहुंच पाये। प्रशासन की तो बात ही मत पूछिए उसे कोई बताये तो जान पाये नहीं बताये तो पूरी तरह अनजान रह जाये। प्रशासन व जन प्रतिनिधि की तंद्रा तब टूटी जब लक्ष्मण स्वर्ग सिधार चुका था। उसके देहावसान के बाद सभी उनकी मदद को आये;;;; इसे दुर्भाग्य नहीं कहेंगे तो और क्या। लेकिन अब पछतायत होत क्या जब चिडि़यां चुग गई खेत ।
ऐसे कई लक्ष्मण हैं जो भुख के कारण मौत को गले लगा रहे हैं। सरकार ने गरीबों के लिए कई योजनाएं चला रखे हैं। लेकिन यह योजनाएं सिर्फ लफ्फाजी साबित होती हैं। इन योजनाओं को जायज मुकाम तक पहुंचाने का बीड़ा उठाये प्रशासन के मुलाजिम ही योजनाओं को गटक जाते हैं।
आखिर जिनके लिए योजनाएं चलाई जा रही है उन तक क्यों नहीं पहुंच रही है यह एक बहुत बड़ा प्रश्न है। इसके लिए जिम्मेवार कौन है।
2/19/2010
बच्चे भगवान का रूप होते हैं
ना तो तपती दोपहर
ना तो कड़ाके की ठंड का कहर
ना तो बरसात
इन्हें किसी का डर नहीं है। इन्हें तो सिर्फ अपना और अपने माता पिता का पेट भरने की फिकर रहती है। बच्चों को भगवान का रूप कहा गया है, क्या आप भगवान को बर्तन धोने कहेंगे, क्या आप भगवान को अपनी साईकिल ठीक करने कहेंगे, क्या आप भगवान को खेत में मजदूरी कहेंगे।
तो फिर इन बच्चों से काम क्यों लिया जा रहा है। इन्हें भी जीवन जीने का हक है।
पिछले दिनों हमारे शहर में पल्स पोलियो अभियान के मद्देनजर प्रभात फेरी निकाली गई थी। जिसमें शहर के सभी विद्यालयों के बच्चे ने अपनी भागीदारी निभाई थी। स्थानीय टावर चौक पर जब रैली मुड़ी तो बगल में एक बच्चा आईसक्रीम बेच रहा था। वह बच्चा रैली को इतनी गहरी निगाहों से देख रहा था मानो उसके मन में कुछ उथल पुथल हो रहा हो। शायद वह सोच रहा था मैं भी इस रैली में काश शामिल हो पाता। मेरी नजर रैली के बदले उसपर जा टिकी थी। मैं उसके नजदीक गया और उसके चेहरे को पढ़ने लगा। मुझसे रहा नहीं गया। मैंने पूछा क्या सोच रहे हो बाबू। उसने कहा कुछ तो नहीं भैया। हमने फिर प्यार से पूछा-----नहीं कुछ तो जरूर सोच रहे हो। उसने मुस्कुराते हुए कहा क्या कहूं भैया आपको आईसक्रीम चाहिए क्या। मैंने कहा दे दो। मैंने उसकी एक आईसक्रीम खरीद ली। खाने लगा और उससे बातें भी करता रहा। वह भी स्कूल जाना चाहता था। लेकिन वह पेट की आग बुझाये या स्कूल जाये। इन छिजित बच्चों के लिए आखिर सरकार क्या कर रही है। सिर्फ घोषणाएं या और कुछ।
ये तस्वीर उन लाचार बच्चों की है जो चाह कर भी स्कूल नहीं जा पाते हैं। शायद उसे किसी ने प्रेरित भी नहीं किया। सिर्फ उससे काम लेना जानते हैं। काम के हिसाब से मजदूरी भी नहीं देते हैं। महीने भर काम करवाने के एवज में 200 से 300 रुपये देते हैं। आखिर यह कहां का न्याय है। सरकार का श्रम विभाग भी कुंभकरण की निद्रा में सोया हुआ है। आखिर इसका निदान कौन करेगा।
यह तभी संभव है, जब हम जागरूक होंगे। हमारा समाज जागरूक होगा। हमें संकल्प लेना होगा।
2/17/2010
जरूरत
संगीता का पति झालु ठेला चलाने का काम करता है। दिन भर जद्दोजहद के बाद किसी तरह 60 से 70 रुपया कमा लेता है। झालु शराब का आदी है। अपनी कमाई का आधा हिस्सा वह शराब पीने में गंवा देता है। बांकी के बचे पैसे वह संगीता को देता है। संगीता उन पैसों में 8 से 10 रुपया रोज बचाती है। ताकि महीने का मकान भाड़ा दिया जा सके। बांकी के पैसे से घर का खाना चलता है। यहां अंदाजा लगाया जा सकता है कि रोज 20 से 25 रुपया का खाना घर में आता है। कमरतोड़ महंगाई में उसके घर में क्या बनता होगा यह कहने की बात नहीं है। किसी तरह अपने और अपने बच्चों का पेट भर लेती है। संगीता को अपने पेट से ज्यादा जवान हो रही बेटी की चिंता है। इतनी कमाई में पेट तो किसी तरह भर जाता है। लेकिन बेटी की शादी कैसे होगी।
वह अपना दुख किसे सुनाये । दुर्भाय से वह गूंगी है। शायद झालू भी घर की परेशानी व दिन भर की मेहनत के कारण थक हार कर शराब को अपना साथी बना लिया है।
ऐसी बात नहीं है कि झालु इस बात को नहीं समझता है। वह भी इस बात को समझता है और बोलते बोलते फफक कर रो पड़ता है। झालु आखिर करें तो क्या करें। घर की माली हालत ठीक नहीं होने के कारण वह पढ़ भी नहीं पाया। किसी तरह दो अक्षर अपना नाम लिख लेता है।
सूर्य निकलते ही झालू ठेला लेकर निकल पड़ता है। गूंगी संगीता भी अपने बच्चों को छोड़कर दूसरे के घर बर्तन बासन धोने चली जाती है। दूसरों के घर से लाये भोजन और झालू की कमाई से बने भोजन को वह अपने बच्चों के बीच बांट देती है। जो बचता है अपना और झालू का पेट भर लेती है।
उसका भाडे़ का घर भी टूटे फूटे खपरैल का है।
झालू ने कहा कि कई नेताओं से अपने उद्धार की बात कही। लेकिन कोई नहीं उनकी बात सुनता थक हार कर अपनी बदहाली का जीवन को अपना साथी बना लिया है। बेटी की शादी की बात पर वह कहता है कि अब ईश्वर ही उसकी बेटी की शादी करायेगा।
यहां गौर करने वाली बात यह है कि हमारे नेता अपने आप को जनता का सेवक कहते हैं। लेकिन सेवा करने में पीछे हो जाते हैं। गरीबों के पैसे को अपने झोली में डाल लेते हैं। यहां तक कि प्रशासन ने भी कभी ध्यान नहीं दिया। न तो उसे इंदिरा आवास मिला, ना लाल कार्ड, मिली उसे क्या तो सिर्फ दुख भरी जिंदगी।
ऐसे कितने झालू मिलेंगे हमारे समाज में। कौन इनकी खैरियत सोचेगा। कौन इनके उद्धार को आगे आयेगा। यह एक यक्ष प्रश्न है।
ऐसे लोगों का उद्धार हो सकता है। बशर्ते की हमारे नेता अपनी मानसिकता बदल लें। प्रशासन अपने कर्तव्यों पर खरा उतरे। समाज के अमीर लोग अपने साथ साथ इनके बारे में भी सोचें।
तो शायद इनका उद्धार हो सकता है। लेकिन यह तभी संभव है जब हम संकल्प लेंगे। इसके लिए हमें ही आगे आना होगा। हमें ही अपने मन में संकल्प की भावना जगानी होगी।
वह अपना दुख किसे सुनाये । दुर्भाय से वह गूंगी है। शायद झालू भी घर की परेशानी व दिन भर की मेहनत के कारण थक हार कर शराब को अपना साथी बना लिया है।
ऐसी बात नहीं है कि झालु इस बात को नहीं समझता है। वह भी इस बात को समझता है और बोलते बोलते फफक कर रो पड़ता है। झालु आखिर करें तो क्या करें। घर की माली हालत ठीक नहीं होने के कारण वह पढ़ भी नहीं पाया। किसी तरह दो अक्षर अपना नाम लिख लेता है।
सूर्य निकलते ही झालू ठेला लेकर निकल पड़ता है। गूंगी संगीता भी अपने बच्चों को छोड़कर दूसरे के घर बर्तन बासन धोने चली जाती है। दूसरों के घर से लाये भोजन और झालू की कमाई से बने भोजन को वह अपने बच्चों के बीच बांट देती है। जो बचता है अपना और झालू का पेट भर लेती है।
उसका भाडे़ का घर भी टूटे फूटे खपरैल का है।
झालू ने कहा कि कई नेताओं से अपने उद्धार की बात कही। लेकिन कोई नहीं उनकी बात सुनता थक हार कर अपनी बदहाली का जीवन को अपना साथी बना लिया है। बेटी की शादी की बात पर वह कहता है कि अब ईश्वर ही उसकी बेटी की शादी करायेगा।
यहां गौर करने वाली बात यह है कि हमारे नेता अपने आप को जनता का सेवक कहते हैं। लेकिन सेवा करने में पीछे हो जाते हैं। गरीबों के पैसे को अपने झोली में डाल लेते हैं। यहां तक कि प्रशासन ने भी कभी ध्यान नहीं दिया। न तो उसे इंदिरा आवास मिला, ना लाल कार्ड, मिली उसे क्या तो सिर्फ दुख भरी जिंदगी।
ऐसे कितने झालू मिलेंगे हमारे समाज में। कौन इनकी खैरियत सोचेगा। कौन इनके उद्धार को आगे आयेगा। यह एक यक्ष प्रश्न है।
ऐसे लोगों का उद्धार हो सकता है। बशर्ते की हमारे नेता अपनी मानसिकता बदल लें। प्रशासन अपने कर्तव्यों पर खरा उतरे। समाज के अमीर लोग अपने साथ साथ इनके बारे में भी सोचें।
तो शायद इनका उद्धार हो सकता है। लेकिन यह तभी संभव है जब हम संकल्प लेंगे। इसके लिए हमें ही आगे आना होगा। हमें ही अपने मन में संकल्प की भावना जगानी होगी।
2/16/2010
सहायता
निरंजन पढ़ा लिखा इंसान है। वह नौकरी करना चाहता है। अपनी कमाई से अपने मां बाप की सेवा करना चाहता है। लेकिन चाह कर भी वह असमर्थ है। क्योंकि उसकी सांसें चल रही है तो सिर्फ ईश्वर की कृपा से। निरंजन की दोनों किडनी खराब हो चुकी है। परिवार के पास उतने अर्थ नहीं हैं जिससे निरंजन का इलाज करवा सके। उसके इलाज में करीब 8 लाख रुपये का खर्च आयेगा। दो दिन यहां के अखबारों में खबर छपी :::: निरंजन जीना चाहता है:::: लोग उसकी मदद को खड़े हुए। यहां के समाज सेवी उसकी मदद को आगे आये।
16 फरवरी दिन के 3 बजे थे। टावर चौक पर कुछ प्रबुद्ध लोग लोगों के जूता पालिस कर रहे थे। पूछने पर पता चला कि सभी निरंजन के इलाज के लिए चंदा इकट्ठा कर रहे हैं। समाज सेवा की यह भावना देख किसी का भी मन पसीज सकता है। कईयों ने इसके लिए हजारों रुपये दिये। लेकिन यहां तो लाखों की जरूरत है। चलिए जो भी हो सेवा की भावना तो जगी। अब आगे की रणनीति है भीक्षाटन। अब शायद निरंजन का इलाज हो पाये। यहां इलाज की जल्दीबाजी भी है। निरंजन के पिता नहीं हैं। उसका बड़ा भाई पारा शिक्षक है। अब आप ही सोच सकते हैं कि घर की माली हालत क्या होगी।
:::::::: समाज में निरंजन जैसे कई लोग हैं जो अर्थ के अभाव में इलाज नहीं करवा पा रहे हैं और काल के गाल में समाते जा रहे हैं। सेवा की भावना मन में जगानी होगी।
समाज में कई लोग ऐसे हैं जो गरीबों व लाचारों की मदद में काम आ सकते हैं। मन में सेवा का संकल्प लेना होगा। मानव मानव के बारे में नहीं सोचेगा तो कौन सोचेगा।
16 फरवरी दिन के 3 बजे थे। टावर चौक पर कुछ प्रबुद्ध लोग लोगों के जूता पालिस कर रहे थे। पूछने पर पता चला कि सभी निरंजन के इलाज के लिए चंदा इकट्ठा कर रहे हैं। समाज सेवा की यह भावना देख किसी का भी मन पसीज सकता है। कईयों ने इसके लिए हजारों रुपये दिये। लेकिन यहां तो लाखों की जरूरत है। चलिए जो भी हो सेवा की भावना तो जगी। अब आगे की रणनीति है भीक्षाटन। अब शायद निरंजन का इलाज हो पाये। यहां इलाज की जल्दीबाजी भी है। निरंजन के पिता नहीं हैं। उसका बड़ा भाई पारा शिक्षक है। अब आप ही सोच सकते हैं कि घर की माली हालत क्या होगी।
:::::::: समाज में निरंजन जैसे कई लोग हैं जो अर्थ के अभाव में इलाज नहीं करवा पा रहे हैं और काल के गाल में समाते जा रहे हैं। सेवा की भावना मन में जगानी होगी।
समाज में कई लोग ऐसे हैं जो गरीबों व लाचारों की मदद में काम आ सकते हैं। मन में सेवा का संकल्प लेना होगा। मानव मानव के बारे में नहीं सोचेगा तो कौन सोचेगा।
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