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8/28/2010

हर मोड़ पर मंडराती मौत

यूं कहें तो हर मोड़ पर मौत मंडराती है। जरा सी चूक व असावधानी के कारण आप मौत को गले लगा सकते हैं। आये दिन हर गली, हर मार्ग पर मौत मुंह बाये खड़ी रहती है। यदि आप जरा सा भी चूके तो पलक झपकते ही आप गए। समाचार पत्रों व टीवी चैनलों पर रोज दर्जनों दुर्घटनाओं के समाचार सुनने को मिलेंगे। खास कर छोटे शहरों में जहां यातायात के नियम सिर्फ दिखावे के लिए होते हैं। सच कहें तो आज कल 50 फीसदी लोगों को अच्‍छी तरह वाहन चलाने आता ही नहीं। वे तो रिश्‍वत देकर वाहन चलाने का लाईसेंस विभाग से बनवा लेते हैं। मुश्किल से आपको 2 से ढ़ाई हजार खर्च होंगे आपको वाहन चलाने आता हो या नहीं लाईसेंस आपको मिल जायेगा। चलिए यह भी मान लेते हैं कि आप वाहन चलाने भली भांति जानते हैं, यातायात के नियम भी आपको पता है लेकिन जब आप वाहन चला रहे होते हैं तो बगल वाले वाहन चालक की क्‍या गारंटी है कि वो वाहन चलाने जानता हो उसे नियम पता हो। वो आपके लिए खतरा बन सकता है। साल भर में देवघर जिले में वाहन दुर्घटना में 1 दर्जन से ज्‍यादा लोगों की मौत होती है। चाहे कारण जो भी हो, यातायात नियम के नाम पर सिर्फ थोथी दलीलें पढ़ी जाती हैं। आज हर शहर में युवा वर्गों में तेज गति से मोटरसाईकिल चलाने का क्रेज है। यह उनके लिए प्रेस्‍टीज बन गया है। इन्‍हें संभालने की जरूरत है।

8/27/2010

लेह का जलजला

लेह के जलजले ने सैकड़ों परिवार का चूल्‍हा ठंडा कर दिया। कई अनाथ हुए, कई महिलाएं असमय विधवा हो गयी, कई मां की गोदें सूनी हो गयी। सरकार ढि़ढोरा पीट कर कहती है मनरेगा के कारण मजदूर रोजी रोटी के लिए बाहर नहीं जा रहे। यदि उन मजदूरों को अपने गृहक्षेत्र में ही दाना पानी मिलता तो वे लेह क्‍यों जाते।
मेरा जिला छोटा है, यहां का जिला प्रशासन भी मनरेगा में अच्‍छे प्रदर्शन के लिए प्रधानमंत्री से सम्‍मान पुरस्‍कार ले कर आया है। यह सम्‍मान पुरस्‍कार शायद झूठा है। यदि मनरेगा की स्थिति अच्‍छी होती तो यहां के मजदूर लेह क्‍यों जाते। लेह के जलजले के कुछ दिनों के बाद से ही धीरे धीरे यह बात छन कर आ रही है कि यहां के मजदूर लेह में फंसे हुए हैं। उनका ना तो कोई अता पता चल रहा है ना ही वे ही कोई अता पता अपने परिवार का लगा रहे हैं। इसके बारे में अभी तक प्रशासन नहीं सोच रही है। उनका पता लगाना किसकी जिम्‍मेवारी है। यदि वो जिंदा हैं तो उन्‍हें घर लाने का काम कौन करेगा। यह जिला प्रशासन का काम है।
कोरे उपलब्धियों का बखान करने में सरकार व प्रशासन को जरा भी झिझक महसूस नहीं होती। शायद उनकी यह पुरानी बीमारी है। तो फिर विकास की बात तो बेमानी ही होगी। झारखंड तो भ्रष्‍टाचार का महासागर है। यहां के हर महकमों में भ्रष्‍टाचार चिपका है।
यह बात समझ में नहीं आती जो जनप्रतिनिधि जनता के बीच से चुने जाते हैं वो क्‍या कर रहे हैं। उन्‍हें क्‍या जब चुनाव आये बस जीत जायें यही उनका उद्देश्‍य होता है इसके बाद जनता को दाना पानी मिले या ना मिले इससे उन्‍हें क्‍या मतलब।
भोली जनता भी उनके लुभावने वादों में फंस जाते हैं। जिसका परिणाम यह होता है सब कुछ रहने पर भी अभाव की जिंदगी उनका साथी बन जाता है।

8/06/2010

लावारिश लाशों को दो गज कफन भी मयस्‍सर नहीं

हर मनुष्‍य की यह ख्‍वाहिश होती है कि जब तक वो जिंदा है तब तक वह सुखी पूर्वक जी सके और जब वह मृत्‍यु प्राप्‍त कर ले तो उसकी अंतिम विदाई चार कांधो से हो । उसका अंतिम संस्‍कार भी धार्मिक रीति रिवाज के साथ हो। चाहे वह हिन्‍दु हो या मुसलमान, सिक्‍ख या ईसाई। सभी धर्मों में अंतिम संस्‍कार का रिवाज है। महापुरुषों ने शायद सही कहा है कलियुग में मनुष्‍य अपना ईमान खोता जा रहा है। सही भी है उसका साक्ष्‍य यह तस्‍वीर है। मनुष्‍य इतना संवेदन हीन हो गया है कि वह मनुष्‍य को उसका हक नहीं दिला पा रहा। कल तक यही मनुष्‍य जो सबके साथ घूमता फिरता था आज उसकी यह स्थिति, बहुत शर्मींदगी की बात है। तस्‍वीर दिल दहला देने वाली है। मनुष्‍य के मरने के बाद यह स्थिति शायद इसके बारे में किसी ने सोचा भी नहीं होगा। यहां ना तो उसे दो गज कफन मिला ना ही दो गज जमीन। वह भी धार्मिक नगरी देवघर में। अखबार वालों ने भी इसे प्रमुखता से छापा। उनकी भी मंशा रही कि शायद खबर से किसी की आंख खुल जाय। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। देवघर शहर जहां द्वादश ज्‍योतिर्लिंगों में एक बाबा बैद्यनाथ विराजमान हैं। उस शहर में प्रशासन इतना संवेदनहीन हो गया है कि लावारिश मरने वालों को वह दो गज कफन मयस्‍सर नहीं करा पा रहा। जबकि प्रशासन को लावारिश लाशों के अंतिम संस्‍कार के लिए पैसे भी हैं। फिर भी इतनी शर्मनाक संवेदनहीनता। इस तस्‍वीर को जरा गौर से देखिए, ये एक लावारिश लाश है जिसे कुत्‍ते नोच नोच कर खा रहे हैं। बगल में एक और लाश पड़ी है सफेद रंग के बोरे में बंद, साथ ही यहां से ठीक 40 गज की दूरी पर एक और लाश पड़ी थी। आखिर क्‍या कसूर था इनका, जो मरने के बाद इन्‍हें कुत्‍तों चीलों के हवाले कर दिया गया। कसूरवार भी हो तो जब तक वह जिंदा है तब तक उसे सजा दी जा सकती है। लेकिन मरने के बाद ऐसी सजा देना यह किस कानून के पन्‍ने में लिखा है। इसका जवाब कौन देगा।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
ऐसी परिस्थिति दुबारा ना हो इसका क्‍या उपाय है। इसका एक ही उपाय है, एकता पूर्वक खड़ा होने का। हम जागरूक होंगे तो जग जागरूक होगा।

7/26/2010

हर हर महादेव

26 जुलाई को विश्‍व प्रसिद्ध श्रावणी मेला शुरू हो गया है। पूरे महीने कांवरियों का जनसैलाब देवघर में उमड़ेगा। उत्‍तरवाहिनी गंगा सुल्‍तानगंज से पांव पैदल चल कर प्रतिदिन हजारों की संख्‍या में कांवरिये बाबाधाम पहुंचेंगे। शिवभक्‍तों को किसी तरह की परेशानी ना हो इसके लिए प्रशासन, स्‍वयं सेवी संस्‍था व आम जन मुस्‍तैद रहेंगे। सभी उनकी सेवा कर पुण्‍य बटोरने की जद्दोजहद में लगे रहेंगे। सुल्‍तानगंज से लेकर देवघर तक शिवभक्‍तों के सेवार्थ हजारों शिविर लगे रहते हैं। लगभग शिविरों में कांवरियों की नि:शुल्‍क सेवा की जाती है। उनके ठहराव, भोजन, चिकित्‍सा सेवा, नींबू पानी, गरम पानी, शर्बत की समुचित व्‍यवस्‍था की जाती है। प्रशासन की ओर से भी भरपूर सेवा की जाती है। पूरे महीने आम जन भी कांवरियों की सेवा में व्‍यस्‍त रहते हैं।
एक बता दूं कि यहां एक कहावत चरितार्थ है। एक महीने कमाओ साल भर खाओ।
दूर दूर से लोग पूरे महीने यहां कमाने आते हैं। छोटे छोटे दुकानों की भरमार रहती है। कोई शहर का कोई हिस्‍सा खाली नहीं रहता। पूरे महीने अरबों का व्‍यवसाय होता है। सबसे ज्‍यादा प्रसाद के रूप में बिकने वाले पेड़ा व इलाईची दाना का। रोज करोड़ों का व्‍यवसाय होता है। और हो भी क्‍यों नहीं लाखों की भीड़ जो जुटती है। श्रावण महीना में इस तरह का नजारा कहीं देखने को नहीं मिलता।
बाबा बैद्यनाथ की पूजा के लिए पूरे महीने रोजाना लंबी कतार लगी रहती है। विशेषत: सोमवार व मंगलवार के दिन। कहते हैं पहले इस तरह की भीड़ नहीं जुटती थी। धीरे धीरे बदलाव आया और मेला का फलक भी बढ़ा। मीडिया कर्मी भी पूरे महीने सावन की खबरों के संकलन में कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहते। वे भी अपना फलक बढ़ाने में लगे रहते हैं।
सुल्‍तानगंज से देवघर तक पांव पैदल आने वाले कांवरियों की कतार पूरे महीने लगी रहती है। कतार ऐसा कि कोई एक डब्‍बा यदि कांवरियों के हाथ दे दिया जाय तो एक दूसरे को बढ़ाते बढ़ाते वह डब्‍बा देवघर आ जायेगा।
रावणेश्‍वर बैद्यनाथ की महिमा ही निराली है। सभी बाबा भोले की मस्‍ती में मस्‍त रहते हैं सभी बोल बम की रट लगाए रहते हैं। उनके मुख से बोल बम का शब्‍द निकला कामन हो जाता है। एक दूसरे को बम कहकर ही पुकारते हैं।

3/31/2010

हर एक फूटपाथ हमारा घर है

उसकी आंखें कुछ कहती थी



मैं सुन रहा था उसके दर्द को


उसकी चुभन को


मेरे जेहन में उसकी हर एक हरकत


घर करती जा रही थी


हमने कहा क्यों बाबू


तुम्हारा घर कहां है


उसने कहा हर एक फूटपाथ हमारा घर है


क्या करते हो


उसने दर्द भरी आवाज में कहा


चाय की दुकान में नौकरी


कितने मिलते हैं


200 रुपया प्रतिमाह


उसकी बातें सुन मेरी दिल से आह निकल गई।


आखिर ऐसा क्यों


होता है इन बच्चों के साथ


कोई न कोई तो होगा देने वाला इनका साथ।


इनके हाथ में हाथ हमें ही देना होगा


इन्हें रास्ते पर लाने का संकल्प?


हमें ही लेना होगा।

3/07/2010

महिला दिवस

महिला दिवस : लोग समारोह आयोजित कर महिलाओं को जागृत करने का संकल्‍प तो लेते हैं लेकिन संकल्‍प सिर्फ समारोह तक ही सीमित रहता है। यह संकल्‍प समारोह स्‍थल से बाहर नहीं निकल पाता है। पहले हमारे द्वारा लिए गए संकल्‍प को और सशक्‍त बनाना होगा। तभी महिला सशक्तिकरण को सही अर्थ मिल सकता है। महिलाओं को सही दिशा मिल सकती है।
इन्‍हें देखिए:::: ये बच्‍ची फूटपाथ पर पापकार्न बनाने का काम कर रही है। लोग पांच रुपया दस रुपया देकर इसे खरीद कर ले जायेंगे। लेकिन उन्‍हें सशक्तिकरण से जोड़ने का कोई प्रयास नहीं करेंगे। ये बच्‍ची दिन भर में मुश्किल से पचास रुपया कमा पाती है। ऐसे में 10 सदस्‍यों वाला परिवार कैसे चल पायेगा। यह इसके लिए यक्ष प्रश्‍न है।

क्‍या कसूर था लक्ष्‍मण का

भुखमरी, यह शब्‍द सुन कर ही जेहन के लाखों करोड़ों रोंगटे खडे़ हो जाते हैं। आखिर लक्ष्‍मण ने ऐसी कौन सी खता की थी कि भुखमरी के कारण उसने काल को गले लगा लिया। लक्ष्‍मण मजदूर था, वह मजदूरी कर अपना और अपने परिवार का पेट पालता था। लेकिन महीनों तक काम नहीं मिलने के कारण वह बेकार घर में बैठा रहा। वह दूसरा और कोई काम भी नहीं कर सकता था जिससे उसे अर्थ की कमाई हो सके। बेकारी ने उसे भुखमरी के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया। अंतत: जीवन की लड़ाई में वह हार गया और काल के गाल में समा गया।
देवघर जिले के मोहनपुर प्रखंड की यह घटना है। लक्ष्‍मण नि:संतान था। रोज की कमाई उसके पेट भरने में मददगार थी लेकिन जब वह बेकार बैठ गया तो उसे खाने के लाले पड़ने लगे। कोई उसके मदद को नहीं आया। यहां कि गांव वाले भी नहीं। आखिर गांव वाले आते भी कैसे पूरे गांव में भीषण गरीबी है। वे अपना पेट पाले की लक्ष्‍मण का। इस उधेड़बुन में लोगों ने लक्ष्‍मण पर ध्‍यान नहीं दिया। आश्‍चर्य करें जिस लक्ष्‍मण के वोट से जन प्रतिनिधि चुने गए वह जन प्रतिनिधि भी उनके मदद को नहीं पहुंच पाये। प्रशासन की तो बात ही मत पूछिए उसे कोई बताये तो जान पाये नहीं बताये तो पूरी तरह अनजान रह जाये। प्रशासन व जन प्रतिनिधि की तंद्रा तब टूटी जब लक्ष्‍मण स्‍वर्ग सिधार चुका था। उसके देहावसान के बाद सभी उनकी मदद को आये;;;; इसे दुर्भाग्‍य नहीं कहेंगे तो और क्‍या। लेकिन अब पछतायत होत क्‍या जब चिडि़यां चुग गई खेत
ऐसे कई लक्ष्‍मण हैं जो भुख के कारण मौत को गले लगा रहे हैं। सरकार ने गरीबों के लिए कई योजनाएं चला रखे हैं। लेकिन यह योजनाएं सिर्फ लफ्फाजी साबित होती हैं। इन योजनाओं को जायज मुकाम तक पहुंचाने का बीड़ा उठाये प्रशासन के मुलाजिम ही योजनाओं को गटक जाते हैं।

आखिर जिनके लिए योजनाएं चलाई जा रही है उन तक क्‍यों नहीं पहुंच रही है यह एक बहुत बड़ा प्रश्‍न है। इसके लिए जिम्‍मेवार कौन है।     

2/19/2010

बच्‍चे भगवान का रूप होते हैं


ना तो तपती दोपहर
ना तो कड़ाके की ठंड का कहर
ना तो बरसात
इन्‍हें किसी का डर नहीं है। इन्‍हें तो सिर्फ अपना और अपने माता पिता का पेट भरने की फिकर रहती है। बच्‍चों को भगवान का रूप कहा गया है, क्‍या आप भगवान को बर्तन धोने कहेंगे, क्‍या आप भगवान को अपनी साईकिल ठीक करने कहेंगे, क्‍या आप भगवान को खेत में मजदूरी कहेंगे।
तो फिर इन बच्‍चों से काम क्‍यों लिया जा रहा है। इन्‍हें भी जीवन जीने का हक है।
पिछले दिनों हमारे शहर में पल्‍स पोलियो अभियान के मद्देनजर प्रभात फेरी निकाली गई थी। जिसमें शहर के सभी विद्यालयों के बच्‍चे ने अपनी भागीदारी निभाई थी। स्‍थानीय टावर चौक पर जब रैली मुड़ी तो बगल में एक बच्‍चा आईसक्रीम बेच रहा था। वह बच्‍चा रैली को इतनी गहरी निगाहों से देख रहा था मानो उसके मन में कुछ उथल पुथल हो रहा हो। शायद वह सोच रहा था मैं भी इस रैली में काश शामिल हो पाता। मेरी नजर रैली के बदले उसपर जा टिकी थी। मैं उसके नजदीक गया और उसके चेहरे को पढ़ने लगा। मुझसे रहा नहीं गया। मैंने पूछा क्‍या सोच रहे हो बाबू। उसने कहा कुछ तो नहीं भैया। हमने फिर प्‍यार से पूछा-----नहीं कुछ तो जरूर सोच रहे हो। उसने मुस्‍कुराते हुए कहा क्‍या कहूं भैया आपको आईसक्रीम चाहिए क्‍या। मैंने कहा दे दो। मैंने उसकी एक आईसक्रीम खरीद ली। खाने लगा और उससे बातें भी करता रहा। वह भी स्‍कूल जाना चाहता था। लेकिन वह पेट की आग बुझाये या स्‍कूल जाये। इन छिजित बच्‍चों के लिए आखिर सरकार क्‍या कर रही है। सिर्फ घोषणाएं या और कुछ।
ये तस्‍वीर उन लाचार बच्‍चों की है जो चाह कर भी स्‍कूल नहीं जा पाते हैं। शायद उसे किसी ने प्रेरित भी नहीं किया। सिर्फ उससे काम लेना जानते हैं। काम के हिसाब से मजदूरी भी नहीं देते हैं। महीने भर काम करवाने के एवज में 200 से 300 रुपये देते हैं। आखिर यह कहां का न्‍याय है। सरकार का श्रम विभाग भी कुंभकरण की निद्रा में सोया हुआ है। आखिर इसका निदान कौन करेगा।
यह तभी संभव है, जब हम जागरूक होंगे। हमारा समाज जागरूक होगा। हमें संकल्‍प लेना होगा।

2/17/2010

संकल्‍प: जरूरत

संकल्‍प: जरूरत

जरूरत

संगीता का पति झालु ठेला चलाने का काम करता है। दिन भर जद्दोजहद के बाद किसी तरह 60 से 70  रुपया कमा लेता है। झालु शराब का आदी है। अपनी कमाई का आधा हिस्‍सा वह शराब पीने में गंवा देता है। बांकी के बचे पैसे वह संगीता को देता है। संगीता उन पैसों में 8 से 10 रुपया रोज बचाती है। ताकि महीने का मकान भाड़ा दिया जा सके। बांकी के पैसे से घर का खाना चलता है। यहां अंदाजा लगाया जा सकता है कि रोज 20 से 25 रुपया का खाना घर में आता है। कमरतोड़ महंगाई में उसके घर में क्‍या बनता होगा यह कहने की बात नहीं है। किसी तरह अपने और अपने बच्‍चों का पेट भर लेती है। संगीता को अपने पेट से ज्‍यादा जवान हो रही बेटी की चिंता है। इतनी कमाई में पेट तो किसी तरह भर जाता है। लेकिन बेटी की शादी कैसे होगी।
वह अपना दुख किसे सुनाये । दुर्भाय से वह गूंगी है। शायद झालू भी घर की परेशानी व दिन भर की मेहनत के कारण थक हार कर शराब को अपना साथी बना लिया है।
ऐसी बात नहीं है कि झालु इस बात को नहीं समझता है। वह भी इस बात को समझता है और बोलते बोलते फफक कर रो पड़ता है। झालु आखिर करें तो क्‍या करें। घर की माली हालत ठीक नहीं होने के कारण वह पढ़ भी नहीं पाया। किसी तरह दो अक्षर अपना नाम लिख लेता है।
सूर्य निकलते ही झालू ठेला लेकर निकल पड़ता है। गूंगी संगीता भी अपने बच्‍चों को छोड़कर दूसरे के घर बर्तन बासन धोने चली जाती है। दूसरों के घर से लाये भोजन और झालू की कमाई से बने भोजन को वह अपने बच्‍चों के बीच बांट देती है। जो बचता है अपना और झालू का पेट भर लेती है।
उसका भाडे़ का घर भी टूटे फूटे खपरैल का है।
झालू ने कहा कि कई नेताओं से अपने उद्धार की बात कही। लेकिन कोई नहीं उनकी बात सुनता थक हार कर अपनी बदहाली का जीवन को अपना साथी बना लिया है। बेटी की शादी की बात पर वह कहता है कि अब ईश्‍वर ही उसकी बेटी की शादी करायेगा।
यहां गौर करने वाली बात यह है कि हमारे नेता अपने आप को जनता का सेवक कहते हैं। लेकिन सेवा करने में पीछे हो जाते हैं। गरीबों के पैसे को अपने झोली में डाल लेते हैं। यहां तक कि प्रशासन ने भी कभी ध्‍यान नहीं दिया। न तो उसे इंदिरा आवास मिला, ना लाल कार्ड, मिली उसे क्‍या तो सिर्फ दुख भरी जिंदगी।
ऐसे कितने झालू मिलेंगे हमारे समाज में। कौन इनकी खैरियत सोचेगा। कौन इनके उद्धार को आगे आयेगा। यह एक यक्ष प्रश्‍न है।
ऐसे लोगों का उद्धार हो सकता है। बशर्ते की हमारे नेता अपनी मानसिकता बदल लें। प्रशासन अपने कर्तव्‍यों पर खरा उतरे। समाज के अमीर लोग अपने साथ साथ इनके बारे में भी सोचें।
तो शायद इनका उद्धार हो सकता है। लेकिन यह तभी संभव है जब हम संकल्‍प लेंगे। इसके लिए हमें ही आगे आना होगा। हमें ही अपने मन में संकल्‍प की भावना जगानी होगी।

2/16/2010

सहायता

निरंजन पढ़ा लिखा इंसान है। वह नौकरी करना चाहता है। अपनी कमाई से अपने मां बाप की सेवा करना चाहता है। लेकिन चाह कर भी वह असमर्थ है। क्‍योंकि उसकी सांसें चल रही है तो सिर्फ ईश्‍वर की कृपा से। निरंजन की दोनों किडनी खराब हो चुकी है। परिवार के पास उतने अर्थ नहीं हैं जिससे निरंजन का इलाज करवा सके। उसके इलाज में करीब 8 लाख रुपये का खर्च आयेगा। दो दिन यहां के अखबारों में खबर छपी :::: निरंजन जीना चाहता है:::: लोग उसकी मदद को खड़े हुए। यहां के समाज सेवी उसकी मदद को आगे आये।
16 फरवरी दिन के 3 बजे थे। टावर चौक पर कुछ प्रबुद्ध लोग लोगों के जूता पालिस कर रहे थे। पूछने पर पता चला कि सभी निरंजन के इलाज के लिए चंदा इकट्ठा कर रहे हैं। समाज सेवा की यह भावना देख किसी का भी मन पसीज सकता है। कईयों ने इसके लिए हजारों रुपये दिये। लेकिन यहां तो लाखों की जरूरत है। चलिए जो भी हो सेवा की भावना तो जगी। अब आगे की रणनीति है भीक्षाटन। अब शायद निरंजन का इलाज हो पाये। यहां इलाज की जल्‍दीबाजी भी है। निरंजन के पिता नहीं हैं। उसका बड़ा भाई पारा शिक्षक है। अब आप ही सोच सकते हैं कि घर की माली हालत क्‍या होगी।
:::::::: समाज में निरंजन जैसे कई लोग हैं जो अर्थ के अभाव में इलाज नहीं करवा पा रहे हैं और काल के गाल में समाते जा रहे हैं। सेवा की भावना मन में जगानी होगी।
समाज में कई लोग ऐसे हैं जो गरीबों व लाचारों की मदद में काम आ सकते हैं। मन में सेवा का संकल्‍प लेना होगा। मानव मानव के बारे में नहीं सोचेगा तो कौन सोचेगा।

2/15/2010

संकल्‍प: क्‍या होगा हमारी संस्‍कृति का

संकल्‍प: क्‍या होगा हमारी संस्‍कृति का

क्‍या होगा हमारी संस्‍कृति का

वेलेनटाईन डे
आखिर क्‍या है वेलेनटाईन डे। हमने एक व्‍यक्ति से यह प्रश्‍न किया। उसने जवाब दिया। अपने प्रेयशी को गिफ्ट देने का दिन है वेलेनटाईन डे। हमने फिर एक प्रश्‍न दागा। ऐसी क्‍या बात है कि लोग आज ही के दिन अपने प्रेयशी को गिफ्ट देते हैं। वह व्‍यक्ति चुप हो गया। उसके पास कोई जवाब नहीं थे। तब हमने कहा। आप नहीं जानते हैं मैं बताता हूं आपको क्‍या है वेलेनटाईन डे।
हमने कहा जानते हैं जिस अंग्रेजों को भगाने के लिए हमारे देश के क्रांतिकारियों ने अपने प्राण गंवा दिये उसी अंग्रेज के जन्‍म दिन को वेलेनटाईन डे के रूप में मनाते हैं। वह व्‍यक्ति बोला ऐसी बात है तो हम कभी नहीं वेलेनटाईन डे मनायेंगे।
यही बात है जो लोग वेलेनटाईन डे मनाते हैं। शायद वह भारतीय कहलाने लायक नहीं हैं। हम क्‍यों अंग्रेज के जन्‍म दिन को मनायें।
मेरा शहर है तो बहुत छोटा  लेकिन है बड़ा रमणीक स्‍थल। मेरे शहर के आसपास प्रकृति का सौंदर्य बिखेरने वाले दर्जनों पहाड़ पर्वत हैं। मैं वेलेनटाईन डे के दिन घूमने निकला। मेरे शहर से 2 किमी की दूरी पर एक छोटा सा पहाड़ है नंदन पहाड़। वहां हमने देखा कई जोड़े छुप छुप कर बैठे हुए थे। आखिर क्‍यों भाई। वेलेनटाईन डे स्‍पेशल क्‍यों। कई दिन हमारे समाज में हैं। पत्नियां अपने पति की सलामती के लिए कई कठिन से कठिन व्रत रखती हैं। वो रखो। वेलेनटाईन डे क्‍यों।
आखिर इन्‍हें समझाये कौन। ऐसा करने वाले के मां बाप भी तो इसी संस्‍कृति में चलने की चेष्‍टा करते हैं। पता नहीं हमारी संस्‍कृति का क्‍या होगा।
 लोगों को इसके बारे में सोचना होगा।
इसके लिए लोगों को आगे आना होगा।
यह तभी संभव है जब हम और आप जागृत होंगे। बिना जागृति के कोई कार्य संपन्‍न नहीं हो सकता। वह अधूरा ही रह जायेगा। अंग्रेजी संस्‍कृति को छोड़ना होगा। इसके लिए हमें संकल्‍प लेना होगा।
जय भारत
जय हिन्‍दुस्‍तान
जय हिन्‍दी
जय हो।।।।।